रेप कानून: दिल्ली हाई कोर्ट में जेंडर न्यूट्रलिटी पर सुनवाई, जानें क्या है मामला
दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता के तहत रेप और यौन अपराधों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तारीख तय की है, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या पुरुषों और ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ गैर-सहमति वाले गैर-योनि यौन कृत्यों के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं होना चाहिए।

सौजन्य से:- ABP News
क्या रेप कानून जेंडर न्यूट्रल होना चाहिए? दिल्ली HC करेगा फैसला
Delhi High Court: कोर्ट ने साफ किया कि किसी कृत्य को अपराध घोषित करना विधायिका की नीति का हिस्सा है. हाई कोर्ट खुद किसी नए अपराध को तय नहीं कर सकती.
दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार (12 अगस्त) को उस जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तारीख तय की, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNA) के तहत रेप समेत यौन अपराधों को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई है. चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि इस मामले को इसी मुद्दे से जुड़ी लंबित याचिकाओं के साथ सुना जाएगा.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ किया कि किसी कृत्य को अपराध घोषित करना विधायिका की नीति का हिस्सा है. हाई कोर्ट खुद किसी नए अपराध को तय नहीं कर सकती. कोर्ट ने कहा कि किसी प्रावधान को किस तरह बनाया जाए और कौन सा कृत्य अपराध माना जाए इसका अंतिम फैसला कानून बनाने वाली संस्था को करना है.
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याचिका में उठाया गया बड़ा सवाल
वकील शुभी श्रीवास्तव और अन्य की ओर से दाखिल PIL में कहा गया है कि मौजूदा BNS में पुरुषों और ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ गैर-सहमति वाले गैर-योनि यौन कृत्यों से निपटने के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं है. याचिका के मुताबिक, मौजूदा कानून मुख्य तौर पर पुरुष द्वारा महिला के खिलाफ किए गए यौन अपराध को ध्यान में रखता है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुराने IPC की धारा 377 हटाए जाने के बाद गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन कृत्यों के लिए कानून में एक तरह का खालीपन पैदा हो गया है. इससे पुरुषों और ट्रांसजेंडर लोगों को भी यौन अपराध का शिकार होने पर महिलाओं जैसी स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पा रही है.
LGBTQ समुदाय की सुरक्षा का मुद्दा भी अदालत में
इसी मुद्दे पर गंतव्य गुलाटी की एक अलग जनहित याचिका भी हाईकोर्ट में लंबित है. इसमें गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध बनाने के लिए पुराने IPC की धारा 377 जैसे प्रावधान की मांग की गई है. याचिका में खास तौर पर LGBTQ समुदाय के लोगों को ऐसी घटनाओं में कानूनी सुरक्षा देने की जरूरत बताई गई है.
7 अक्टूबर को होगी विस्तृत सुनवाई
हाई कोर्ट अब दोनों मामलों को साथ लेकर आगे सुनवाई करेगा. हालांकि बुधवार की सुनवाई में बेंच ने यह संकेत साफ कर दिया कि नया अपराध तय करने या कानून का दायरा बढ़ाने का फैसला अदालत नहीं, बल्कि संसद को करना होगा.
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