यौन उत्पीड़न की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करना जिम्मेदारी: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकायत पर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं करना चाहिए, चाहे शिकायतकर्ता के पास सबूत नहीं हों. पुलिस को शिकायत दर्ज करने के बाद निष्पक्ष जांच करनी होती है और सबूत जुटाने होते हैं।

सौजन्य से:- ईटीवी भारत
यौन उत्पीड़न की शिकायत पर सबूत न होने के आधार पर एफआईआर से इनकार नहीं कर सकती पुलिस : हाईकोर्ट
जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की जांच का पुलिस महानिदेशक को आदेश.
ई. टी. वी. भारत उत्तर प्रदेश टीम द्वारा
प्रकाशित : अगस्त 12, 2026 ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. 10:02 अपराह्न भारतीय समय
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यौन उत्पीड़न जैसे संज्ञेय अपराध की शिकायत पर पुलिस केवल इस आधार पर एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती कि शिकायतकर्ता महिला ने व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए हैं. पुलिस को शिकायत दर्ज कर निष्पक्ष जांच कर साक्ष्य जुटाने होते हैं. शिकायतकर्ता पर एफआईआर दर्ज कराने के चरण में ही सबूत जुटाने का बोझ नहीं डाला जा सकता.
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कंपनी के मालिक के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, डिजिटल पेनिट्रेशन और आपराधिक धमकी के आरोपों वाली एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की.
मामले में कंपनी में प्रशासनिक पद पर कार्यरत महिला ने आरोप लगाया था कि नियोक्ता ने बार-बार उसका यौन उत्पीड़न किया, छेड़छाड़ और धमकी दी तथा मार्च 2026 में उसके साथ डिजिटल पेनिट्रेशन किया. महिला ने पहले गाजियाबाद के वेव सिटी थाने और पुलिस कमिश्नर से शिकायत की, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई. इसके बाद उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट का दरवाजा खटखटाया. मजिस्ट्रेट ने 20 जुलाई 2026 को एफआईआर दर्ज कर जांच का आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर रद्द करने के चरण में आरोपों की सत्यता या विवादित तथ्यों का अंतिम निर्धारण नहीं किया जा सकता. शुरुआती स्तर पर चैट या रिकॉर्डिंग उपलब्ध न होना आरोपों को झूठा साबित नहीं करता. जांच के दौरान पुलिस कॉल डिटेल, लोकेशन, ग्राहक विवरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जुटा सकती है.
कोर्ट ने ललिता कुमारी मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है. पुलिस को आरोप सही या गलत तय करने के बजाय जांच करनी होती है. आरोपों की सत्यता और आरोपी के दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय आपराधिक अदालत करेगी.
कोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का खुलासा होने के बावजूद पुलिस ने शुरुआत में एफआईआर क्यों दर्ज नहीं की. हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को गाजियाबाद पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कर चार सप्ताह में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया. साथ ही जांच निष्पक्ष और कानून के अनुसार सुनिश्चित करने को कहा.
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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