दुष्कर्म पीड़िताओं को 24 सप्ताह तक के गर्भपात के लिए अदालत की मंजूरी नहीं की जरूरत: हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक न्यायिक मिसाल के आधार पर कहा है कि दुष्कर्म पीड़िताओं को 24 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने के लिए अदालत की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। उच्च न्यायालय ने 16 वीं श्रेणी के दुष्कर्म पीड़िता के पिता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया

सौजन्य से:- ईटीवी भारत
दुष्कर्म पीड़िताओं को 24 सप्ताह तक के गर्भपात के लिए अदालत की मंजूरी की जरूरत नहीं: HC
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच का फैसला, दुष्कर्म पीड़िताओं को 24 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने के लिए अदालत की मंजूरी की आवश्यकता नहीं.
पी. टी. आई. द्वारा
प्रकाशित : अगस्त 12, 2026 ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. 10:40 अपराह्न भारतीय समय
इंदौर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक न्यायिक मिसाल का हवाला देते हुए कहा है कि दुष्कर्म पीड़िता, जिनकी गर्भावस्था 24 सप्ताह तक की है उनको गर्भपात के लिए अदालत की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है.
16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के पिता ने मांगी थी गर्भपात की अनुमति
इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति संदीप एन भट्ट ने 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के पिता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की और राज्य स्वास्थ्य विभाग के आयुक्त को खंडपीठ के आदेश को सभी संबंधित अस्पतालों, विशेष रूप से सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में प्रसारित करने का निर्देश दिया, ताकि वे भविष्य में ऐसी स्थितियों से निपट सकें.
दरअसल, नाबालिग ने गंभीर मानसिक आघात का हवाला देते हुए यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप 18 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
गर्भपात के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत की मंजूरी की जरूरत नहीं
उच्च न्यायालय ने 20 फरवरी, 2025 को उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 के तहत, यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म या अनाचार से बचे लोगों को गर्भपात कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालती कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता नहीं है.
याचिकाकर्ता के वकील आशीष चौबे ने कहा कि "नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता ने अपने पिता के माध्यम से उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी और अवांछित गर्भावस्था को कानूनी रूप से समाप्त करने के लिए उचित निर्देश देने की मांग की थी." उन्होंने कहा कि लड़की दुष्कर्म के कारण हुए गर्भ को जारी नहीं रखना चाहती क्योंकि वह अत्यधिक मानसिक परेशानी में है.
उच्च न्यायालय ने 2025 के फैसले में कहा था कि "यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म या अनाचार से बचे लोगों के मामले में, 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था को एक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा समाप्त किया जा सकता है और जहां गर्भावस्था 20 सप्ताह से अधिक है, लेकिन 24 सप्ताह से अधिक नहीं है, दो पंजीकृत चिकित्सा चिकित्सकों द्वारा चिकित्सा गर्भपात अधिनियम, 1971 की धारा 3 के प्रावधानों और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार अनुच्छेद के तहत उच्च न्यायालय के समक्ष न्यायिक कार्यवाही का सहारा लिए बिना समाप्त किया जा सकता है.
हाईकोर्ट ने कहा था, "यहां यह उल्लेख करना भी प्रासंगिक है कि यौन अपराधों से बच्चों की सुरक्षा नियम, 2020 का नियम 6 (3) किसी बच्चे को आपातकालीन चिकित्सा देखभाल प्रदान करने वाले चिकित्सक, अस्पताल या अन्य चिकित्सा सुविधा केंद्र को भी ऐसी देखभाल प्रदान करने के लिए किसी भी कानूनी या मजिस्ट्रियल आवश्यकता या अन्य दस्तावेज की मांग नहीं करने का आदेश देता है."
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