हाईकोर्ट का आदेश: गैर-संज्ञेय अपराध में चार्जशीट पर संज्ञान आदेश अवैध करारा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गैर-संज्ञेय अपराधों से जुड़े मामलों में पुलिस की चार्जशीट को राज्य सरकार के मुकदमे के बजाय शिकायत मामले के रूप में मानने का आदेश दिया है. कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है.

सौजन्य से:- ईटीवी भारत
हाईकोर्ट का आदेश; "नए कानून में गैर संज्ञेय अपराध में चार्जशीट पर दर्ज होगा कंप्लेंट केस"
गैर-संज्ञेय अपराधों में चार्जशीट पर संज्ञान आदेश अवैध करार.
ई. टी. वी. भारत उत्तर प्रदेश टीम द्वारा
प्रकाशित : अगस्त 12, 2026 ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. ए. 11:08 अपराह्न भारतीय समय
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि गैर-संज्ञेय अपराधों से जुड़े मामलों में पुलिस की चार्जशीट को राज्य सरकार के मुकदमे के बजाय शिकायत मामले के रूप में माना जाए, ऐसा न करना अवैध होगा. इसी के साथ कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और नियमानुसार कार्यवाही करने की छूट दी है. यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने शिव नरेश की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है.
कौशाम्बी जिले के संदीपनघाट थाने के मामले में आरोपी शिव नरेश के खिलाफ आईपीसी की धारा 115(2), 351(2) व 352 के तहत मामला दर्ज हुआ था. इन धाराओं में चार्जशीट दाखिल हुई और ग्राम न्यायालय चायल के न्यायाधिकारी ने संज्ञान लेते हुए आरोपी को सम्मन जारी किया था. याची की ओर से अधिवक्ता अमित सिंह परिहार ने दलील दी गई कि उक्त धाराएं गैर-संज्ञेय प्रकृति की हैं इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 2(1)(एच) के स्पष्टीकरण के अनुसार पुलिस की चार्जशीट को पुलिस रिपोर्ट नहीं बल्कि शिकायत माना जाना चाहिए था.
कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि धारा 2(1)(एच) के स्पष्टीकरण के अनुसार जब जांच के बाद किसी गैर-संज्ञेय अपराध का खुलासा होने वाली पुलिस रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो उसे शिकायत माना जाएगा और संबंधित जांच अधिकारी को शिकायतकर्ता माना जाएगा. कोर्ट ने कहा कि कौशाम्बी की अदालत ने इसे राज्य का मामला मानकर संज्ञान लेने में विधिक भूल की है. हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश संबंधित अदालत को आवश्यकता पड़ने पर इस मामले को कानून के अनुसार शिकायत मामले के रूप में आगे बढ़ाने से नहीं रोकेगा.
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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