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बीएनएस में आईपीसी की धारा 377 जैसी नई धारा नहीं बनने की दिल्ली हाईकोर्ट की प्रतिबद्धता

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि वह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में नई धारा नहीं बना सकती जैसी कि आईपीसी की धारा 377 के तरह के अपराधों के लिए। अदालत ने कहा कि यह विधायी नीति का विषय है और इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल विधायिका को है।

12 अगस्त 2026 को 01:56 pm बजे
बीएनएस में आईपीसी की धारा 377 जैसी नई धारा नहीं बनने की दिल्ली हाईकोर्ट की प्रतिबद्धता

सौजन्य से:- अमर उजाला

अदालत बीएनएस में आईपीसी की धारा 377 जैसी नई धारा नहीं बना सकती : हाईकोर्ट

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खंडपीठ ने कहा- कानून में अपराध का स्पष्ट प्रावधान करना विधायिका का अधिकार

अमर उजाला ब्यूरो

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में उन अपराधों के लिए नई धारा नहीं बना सकता, जिन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अपराध माना जाता था, लेकिन नए कानून में हटा दिया गया है। अदालत ने कहा कि यह विधायी नीति का विषय है और इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल विधायिका को है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि अदालत याचिकाकर्ताओं की चिंता समझती है, लेकिन वह न्यायिक आदेश के जरिए ऐसा अपराध नहीं बना सकती, जिसका प्रावधान कानून में नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि जब अपराध का स्पष्ट वर्णन ही कानून में नहीं है तो उसे कौन तय कर सकता है? इसका अधिकार विधायिका के पास है।

याचिका में दलील-प्रावधानों में पुरुष को अपराधी मानकर व्यवस्था बनाई गई है

अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बीएनएस के दुष्कर्म, यौन हमला, पीछा करने और ताक-झांक से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन प्रावधानों में अपराधी को पुरुष और पीड़ित को महिला मानकर व्यवस्था बनाई गई है, जो समानता के सांविधानिक अधिकार के अनुरूप नहीं है।

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बीएनएस के प्रावधानों को लिंग-तटस्थ बनाने की मांग

याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों की लिंग-तटस्थ व्याख्या करने या केंद्र सरकार को कानून में संशोधन का निर्देश देने की मांग की। उनका कहना है कि आईपीसी की धारा 377 को बीएनएस में पूरी तरह हटा दिया गया है और उसकी जगह कोई वैकल्पिक प्रावधान नहीं है। इससे पुरुषों, ट्रांसजेंडर और थर्ड जेंडर व्यक्तियों या जानवरों के खिलाफ होने वाले कुछ यौन अपराधों पर कानूनी संरक्षण का सवाल खड़ा होता है।

अगली सुनवाई अक्तूबर में

अदालत ने कहा कि बीएनएस में संबंधित प्रावधान महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े हैं और उनकी व्याख्या कर अप्राकृतिक अपराधों को उनके दायरे में नहीं लाया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई अक्तूबर में होगी।

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अमर उजाला ब्यूरो

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में उन अपराधों के लिए नई धारा नहीं बना सकता, जिन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अपराध माना जाता था, लेकिन नए कानून में हटा दिया गया है। अदालत ने कहा कि यह विधायी नीति का विषय है और इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल विधायिका को है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि अदालत याचिकाकर्ताओं की चिंता समझती है, लेकिन वह न्यायिक आदेश के जरिए ऐसा अपराध नहीं बना सकती, जिसका प्रावधान कानून में नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि जब अपराध का स्पष्ट वर्णन ही कानून में नहीं है तो उसे कौन तय कर सकता है? इसका अधिकार विधायिका के पास है।

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याचिका में दलील-प्रावधानों में पुरुष को अपराधी मानकर व्यवस्था बनाई गई है

अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बीएनएस के दुष्कर्म, यौन हमला, पीछा करने और ताक-झांक से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन प्रावधानों में अपराधी को पुरुष और पीड़ित को महिला मानकर व्यवस्था बनाई गई है, जो समानता के सांविधानिक अधिकार के अनुरूप नहीं है।

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बीएनएस के प्रावधानों को लिंग-तटस्थ बनाने की मांग

याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों की लिंग-तटस्थ व्याख्या करने या केंद्र सरकार को कानून में संशोधन का निर्देश देने की मांग की। उनका कहना है कि आईपीसी की धारा 377 को बीएनएस में पूरी तरह हटा दिया गया है और उसकी जगह कोई वैकल्पिक प्रावधान नहीं है। इससे पुरुषों, ट्रांसजेंडर और थर्ड जेंडर व्यक्तियों या जानवरों के खिलाफ होने वाले कुछ यौन अपराधों पर कानूनी संरक्षण का सवाल खड़ा होता है।

अगली सुनवाई अक्तूबर में

अदालत ने कहा कि बीएनएस में संबंधित प्रावधान महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े हैं और उनकी व्याख्या कर अप्राकृतिक अपराधों को उनके दायरे में नहीं लाया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई अक्तूबर में होगी।

न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत

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