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सुप्रीम कोर्ट ने एआई के अनियंत्रित उपयोग के खतरे की चेतावनी दी

भारत की सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक निर्णयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के अनियंत्रित उपयोग के खतरे की चेतावनी दी है। अदालत ने यह भी बताया कि एआई को केवल न्यायाधीशों की सहायता करनी चाहिए, न कि मानवीय न्यायिक तर्क की जगह लेनी चाहिए।

4 जुलाई 2026 को 08:23 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने एआई के अनियंत्रित उपयोग के खतरे की चेतावनी दी

सौजन्य से:- Sanskriti IAS

Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM

Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 5th July 2026, 8:00 AM

English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 20th July 2026

English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM

Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th July 2026, 6:00 PM

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English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 15th July 2026, 8:00 AM

- मुख्य कारण : सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के आदेशों को इस बात का पता चलने के बाद खारिज कर दिया कि उन्होंने एक मामले का फैसला करते समय फर्जी, अस्तित्वहीन और एआई-जनित (हैलुसिनेटेड/काल्पनिक) न्यायिक मिसालों (precedents) पर भरोसा किया था।

- अदालत की टिप्पणी : इस घटना को न्याय वितरण प्रणाली के लिए एक गंभीर खतरा बताते हुए, अदालत ने चेतावनी दी कि न्यायिक कार्यवाही में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का अनियंत्रित उपयोग विनाशकारी परिणाम ला सकता है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि एआई को केवल न्यायाधीशों की सहायता करनी चाहिए, न कि मानवीय न्यायिक तर्क की जगह लेनी चाहिए।

- अनुमति प्राप्त कार्य : सुप्रीम कोर्ट के ड्राफ्ट एआई रेगुलेशन प्रशासनिक और सहायक कार्यों के लिए एआई के उपयोग की अनुमति देते हैं, जिसमें केस मैनेजमेंट (मामला प्रबंधन), सुनवाई का निर्धारण, 'कॉज़ लिस्ट' तैयार करना, अदालती कार्यवाही का ट्रांसक्रिप्शन (लिखित रूप में दर्ज करना), फैसलों का अनुवाद, कानूनी शोध (लीगल रिसर्च), दस्तावेजों का वर्गीकरण और मेटाडेटा निकालना शामिल है।

- प्रतिबंधित कार्य : ये नियम एआई को न्यायिक कार्य करने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करते हैं, जैसे कि जोखिम का आकलन (risk scoring), दोबारा अपराध करने की प्रवृत्ति (recidivism) की भविष्यवाणी करना, जमानत की पात्रता तय करना, गवाहों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करना, सजा की सिफारिश करना या कोई भी न्यायिक निर्णय लेना। अंतिम न्यायिक अधिकार हमेशा मानव न्यायाधीशों के पास ही होना चाहिए।

- अन्य प्रावधान : यह मसौदा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के अनुपालन को अनिवार्य बनाता है; धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, विकलांगता या आर्थिक स्थिति के आधार पर एल्गोरिद्मिक भेदभाव को रोकता है; और न्यायपालिका में एआई को अपनाने की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के तहत एक स्थायी 'एपेक्स एआई सुपरवाइजरी बॉडी' (शीर्ष एआई निगरानी संस्था) की स्थापना का प्रस्ताव करता है।

- e-Courts परियोजना : ई-कोर्ट प्रोजेक्ट के तहत, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित एआई उपकरण पहले से ही गैर-न्यायिक कार्यों में अदालतों की सहायता कर रहे हैं, जैसे कि मौखिक तर्कों का ट्रांसक्रिप्शन, फैसलों का अनुवाद, ई-फाइलिंग में कमियों की पहचान, कानूनी शोध, दस्तावेजों का संक्षेपीकरण (summarisation) और मेटाडेटा निकालना।

- डिजिटल परिवर्तन : पिछले एक दशक में, वर्चुअल कोर्ट (आभासी अदालतों), ई-फाइलिंग, ऑनलाइन केस मैनेजमेंट सिस्टम, डिजिटल रिकॉर्ड और फैसलों तक बहुभाषी पहुंच के माध्यम से भारत की न्यायपालिका में तेजी से डिजिटल बदलाव आया है।

- तकनीकी एकीकरण : न्यायिक दक्षता और न्याय तक जनता की पहुंच को बेहतर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML), ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) जैसी उन्नत तकनीकों को तेजी से एकीकृत किया जा रहा है।

- लंबित मामलों में कमी : एआई दोहराव वाले प्रशासनिक कार्यों को स्वचालित करके, केस मैनेजमेंट में सुधार करके, कानूनी शोध में सहायता करके और न्यायाधीशों को जटिल संवैधानिक और कानूनी मुद्दों पर अधिक समय देने में सक्षम बनाकर लंबित मामलों के भारी बोझ को कम करने में मदद कर सकता है।

- न्याय तक आसान पहुंच : एआई फैसलों का बहुभाषी अनुवाद, एआई-आधारित कानूनी सहायता, त्वरित दस्तावेज प्रसंस्करण (document processing) और वादियों (litigants) के लिए बेहतर सहायता प्रदान करके न्याय तक पहुंच में सुधार करता है।

- सफल उदाहरण : SUVAAS (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) जैसी परियोजनाओं ने पहले ही हजारों सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया है, जिससे पूरे भारत में न्याय अधिक सुलभ हो गया है।

- गलत परिणाम : एआई सिस्टम काल्पनिक फैसले (hallucinated judgments), फर्जी कानूनी संदर्भ/साइटेशन, गलत कानूनी विश्लेषण या पक्षपातपूर्ण खोज परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं, जो उचित मानवीय सत्यापन (human verification) के बिना उपयोग किए जाने पर न्यायिक निर्णयों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को कमजोर कर सकते हैं।

- अन्य प्रमुख चिंताएं : इसमें डेटा गोपनीयता (data privacy), एल्गोरिद्मिक पूर्वाग्रह (bias), पारदर्शिता की कमी, नैतिक मुद्दे, अपर्याप्त डिजिटल बुनियादी ढांचा और एआई पर अत्यधिक निर्भरता शामिल हैं। ये सभी मजबूत विनियामक सुरक्षा उपायों और निरंतर मानवीय निगरानी की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं।

- मानव-केंद्रित दृष्टिकोण: भारत को एक मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जहां एआई केवल एक निर्णय-सहायता उपकरण (decision-support tool) के रूप में कार्य करे, जबकि न्यायाधीशों के पास न्यायिक तर्क और अंतिम फैसलों पर पूर्ण अधिकार बना रहे। अदालत की कार्यवाही में उपयोग किए जाने से पहले प्रत्येक एआई-जनित आउटपुट को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना चाहिए।

- नियामक ढांचा: न्यायपालिका में एआई को विनियमित करने के लिए एक व्यापक कानूनी और नैतिक ढांचा स्थापित किया जाना चाहिए।

- बुनियादी ढांचे में सुधार: डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, न्यायिक डेटा को सुरक्षित रखना, न्यायाधीशों और वकीलों के बीच एआई साक्षरता में सुधार करना और पारदर्शिता, जवाबदेही व संवैधानिक अनुपालन सुनिश्चित करना भारत की न्याय प्रणाली में एआई के जिम्मेदार और प्रभावी उपयोग को सक्षम बनाएगा।

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