बिहार में कानूनी लड़ाइयों के बाद शराबबंदी कानून का क्या हाल?
बिहार में शराबबंदी कानून कानूनी लड़ाइयों के बाद अपना रूप बदल चुका है। नीतीश कुमार की राज्य सरकार ने 2016 में शराबबंदी कानून लागू किया, लेकिन पटना हाईकोर्ट के फैसले से लगे झटके के बाद बिहार सरकार ने शराबबंदी कानून में संशोधन करना पड़ा।

सौजन्य से:- Navbharat Times
बिहार में सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में शराब के सेवन को गलत और अनैतिक माना जाता है। ऐसा धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण के कारण होता है। बिहार में चाहे कोई कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो वह अपने माता-पिता या पुत्र-पुत्री के सामने शराब नहीं पी सकता। कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन बहुसंख्यक लोग शराब पीने को अच्छा नहीं मानते।
लेकिन इस राज्य में कुछ लोग शराब पीने को व्यक्तिगत आजादी से जोड़ कर उसकी वकालत करते हैं। कुछ लोग राजस्व क्षति के आधार पर इसकी वकालत करते हैं। अब देखते हैं कि कानून क्या कहता है?
महिलाओं के कहने पर लागू हुई थी शराबबंदी
जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे तब विभिन्न यात्राओं के दौरान उन्हें कई गरीब महिलाओं ने शराब से बर्बाद होते अपने परिवार की आपबीती सुनायी थी। गरीबी, कलह और पारिवारिक हिंसा से जुड़ी कई दर्द भरी कहानियां सुनायी थीं। जनता दरबार में भी कई महिलाओं ने ऐसी ही शिकायतें कीं। तब नीतीश कुमार ने 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू कर दी।उस समय यह कदम एक कानून से अधिक सामाजिक सुधार की दिशा में उठाया गया कदम था। बिहार विधानसभा में सभी दलों ने शराबबंदी के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूर किया था। यानी सभी दलों ने शराबबंदी को अच्छा माना था। लेकिन बाद में शराबबंदी पर राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हो गया। पटना हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई चली।
सितम्बर 2016 में पटना हाईकोर्ट ने शराबबंदी कानून को रद्द कर दिया
नीतीश सरकार ने अप्रैल 2016 में शराबबंदी की अधिसूचना जारी की थी। शराब पीना और बेचना गैरकानूनी दायरे में आ गया। तब बिहार के शराब विक्रेताओं के संगठन ने इस अधिसूचना को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी। पटना हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए 30 सितम्बर 2016 को शराबबंदी कानून को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। इस शराबबंदी कानून में कई सख्त दंडात्मक प्रावधान थे जिसे हाईकोर्ट ने अनुचित बताया।बिहार सरकार ने कड़े प्रावधानों के साथ लागू किया
हाईकोर्ट का फैसला आने को दो दिन बाद यानी गांधी जयंती के दिन (2 अक्टूबर, 2016) शराबबंदी कानून को और भी कड़े प्रावधान के साथ ‘बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम 2016’ लागू कर दिया। इस कानून में उल्लेख था कि अगर घर के किसी एक सदस्य के पास शराब मिलती है तो उस घर के हर बालिग सदस्यों को जेल भेज दिया जाएगा।शराबबंदी पर पटना हाईकोर्ट के फैसले से लगे झटके बाद बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट में बिहार शराबबंदी कानून पर सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्टूबर 2016 को पटना हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शराब पीना और मौलिक अधिकार एक साथ नहीं चल सकते। सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद बिहार में शराबबंदी कानून लागू और प्रभावी रहा।
कोर्ट पर 2 लाख मुकदमों का बोझ
लेकिन शराबबंदी के सख्त कानूनों के कारण एक समस्या उत्पन्न हो गयी। शराब से जुड़े मुकदमों का बोझ अदालतों पर लगातार बढ़ता गया। इतने अधिक मामले दर्ज होने लगे कि कोर्ट को सुनवाई करने में परेशानी खड़ी हो गयी। इसके चलते अन्य महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई में देरी होने लगी।अदालतों पर जब शराब से जुड़े मुकदमों का बोझ जब जरूरत से ज्यादा बढ़ गया तो उसने समय-समय पर बिहार सरकार को फटकार लगानी शुरू कर दी। 2019 में पटना हाईकोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े मामलों का बोझ बढ़ने पर बिहार सरकार से जवाब तलब किया था। उस समय राज्य की विभिन्न अदालतों में शराबबंदी से जुड़े 2 लाख से अधिक केस लंबित थे।
कोर्ट की टिप्पणी, शराबबंदी से भ्रष्ट अफसरों की चांदी
इसके बाद शराबबंदी कानून में गिरफ्तारी और पुलिस की मनमानी पर सवाल उठने लगे। तब पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी कानून की नयी रूपरेखा तय करने और पुलिस की मनमानी पर रोक लगाने में बड़ी भूमिका निभायी। 2018 में पटना हाईकोर्ट ने शराब मिलने पर पूरे परिवार (बालिग) को जेल भेजने के प्रावधान को गलत ठहरा दिया। तब बिहार सरकार को बाध्य हो कर शराबबंदी कानून में संशोधन करना पड़ा।इसके बाद नवम्बर 2024 में पटना हाईकोर्ट ने मुकेश पासवान बनाम बिहार राज्य मामले की सुनवाई करते हुए बिहार सरकार पर बेहद कठोर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, सख्त प्रावधानों के कारण राज्य के पुलिस विभाग, उत्पाद विभाग और परिवहन विभाग के भ्रष्ट अफसरों की चांदी हो गयी है। शराबबंदी का मतलब हो गया है मोटी कमाई। ये अधिकारी तस्करों की सांठगांठ से ऐसा कर रहे हैं।
ब्रेथ एनलाइजर टेस्ट पर उठा सवाल?
2025 में पटना हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ ब्रेथ एनलाइजर टेस्ट से ही किसी को शराब पीने का दोषी नहीं माना जा सकता। यानी ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट दोषी मानने का एक मात्र आधार नहीं हो सकता। पुलिस ने यदि आरोपी की ब्लड या यूरिन सैंपल लेकर लैब जांच नहीं करायी है तो केवल मशीन रीडिंग के आधार बना कर आरोपी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसके बाद शराब की जांच के लिए किसी वाहन की तलाशी के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य कर दिया गया। इससे जांच के नाम पर किसी निर्दोष को फंसाने की पुलिस की प्रवृत्ति पर रोक लगी।कोर्ट ने इसे संवैधानिक माना
कई कानून उतार चढ़ाव के बावजूद शराबबंदी कानून बिहार में प्रभावी है। अदालतों ने इस नीति को पूरी तरह से संवैधानिक मानते हुए इसे खत्म करने से इंकार कर दिया है। हां, समय समय पर कोर्ट बिहार सरकार को इस नीति के कानून सम्मत क्रियान्वयन के लिए आदेश और निर्देश देता रहा है। शराबबंदी कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि शराब पीना कोई मौलिक अधिकार नहीं।कोर्ट ने इस कानून के सामाजिक सरोकार (खास कर महिलाओं के संबंध में) को भी मान्यता दी है। यह कानून वैध तो है लेकिन सुप्रीम कोर्ट अभी भी पुलिस को मिले असीमित अधिकारों की समीक्षा कर रहा है। पुलिस की शक्तियों और निजता के अधिकार से जुड़ा मामला, अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
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