दिल्ली हाई कोर्ट ने CBI के छह अधिकारियों पर झूठी गवाही के लिये धारा 340 के तहत कार्रवाई का आदेश दिया
कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों से मिलने वाली जानकारी सटीक होनी चाहिए, जानबूझकर गलत बयान न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाता है। इस आधार पर उसने विशेष न्यायाधीश को चार हफ्तों के भीतर लिखित शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसमें इंस्पेक्टर सुशील दीवान और अन्य पांच अधिकारियों शामिल हैं। यह आदेश IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के दस्तावेज़ वापसी के विवाद से जुड़ी झूठी गवाही के मामले में दिया गया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
दिल्ली हाई कोर्ट ने अदालत को कथित तौर पर गलत जानकारी देने के मामले में CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ धारा 340 CrPC के तहत कार्रवाई का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि जानबूझकर गलत सूचना न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को प्रभावित करती है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को जांच एजेंसियों की ओर से दी गई जानकारी पर भरोसा करने में सक्षम होना चाहिए। जानबूझकर गलत सूचना देना न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता को सीधे प्रभावित करता है। कोर्ट ने इसी टिप्पणी के साथ CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ झूठी गवाही (perjury) के मामले में कार्रवाई का आदेश दिया है।
जस्टिस मधु जैन ने 6 अक्टूबर को ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए CBI के छह अधिकारियों के खिलाफ CrPC की धारा 340 के तहत कार्रवाई का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पेशल जज को चार हफ्ते के भीतर लिखित शिकायत दर्ज करने को कहा है। जिन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी, उनमें इंस्पेक्टर सुशील दीवान, जॉइंट डायरेक्टर विनीत विनायक, ब्रांच हेड अमित कुमार, SP रमन त्यागी, SP प्रेम कुमार गौतम और स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर मोहम्मद आजाद शामिल हैं।
CBI ने दस्तावेज लौटाने की मांग का किया विरोध
मामला IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की आपराधिक अपील से जुड़ा है। अग्रवाल को आय से अधिक संपत्ति के मामले में बरी कर दिया गया था। उनके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी को अमान्य करार दिया गया था। इसके बाद उन्होंने जांच के दौरान CBI द्वारा जब्त किए गए दस्तावेज लौटाने की मांग की थी। इस मांग के विरोध में CBI ने 2 अगस्त 2016 को अदालत में जवाब दाखिल किया। इसमें कहा गया था कि मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही है।
मंत्रालय की राय पहले ही आ चुकी थी, फिर CBI ने क्यों बताया बातचीत जारी?
हालांकि, बाद में सामने आई आधिकारिक फाइल नोटिंग से पता चला कि कानून एवं न्याय मंत्रालय 8 जून 2016 को ही यह राय दे चुका था कि आदेश के खिलाफ किसी उच्च मंच पर अपील करने का उचित आधार नहीं है। यह राय 1 जुलाई को DoPT के जरिए CBI तक पहुंच चुकी थी। हाई कोर्ट ने पाया कि शुरुआती ड्राफ्ट में मंत्रालय की राय का स्पष्ट उल्लेख था। लेकिन बाद में हाथ से किए गए बदलावों के जरिए यह कहा गया कि बाहरी स्तर पर बातचीत चल रही है। कोर्ट ने कहा कि आंतरिक विचार-विमर्श को सक्रिय पत्राचार या बाहरी बातचीत नहीं बताया जा सकता।
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दलील खारिज की
ट्रायल कोर्ट ने इसे भाषा के गलत इस्तेमाल तक सीमित मानते हुए कहा था कि इससे अपीलकर्ता को कोई नुकसान नहीं हुआ। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 340 CrPC के तहत कार्रवाई के लिए यह देखना जरूरी है कि जानबूझकर बोले गए झूठ का न्यायिक प्रक्रिया पर क्या असर पड़ा, न कि इससे किसी पक्ष को कितना व्यक्तिगत नुकसान हुआ। हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जानबूझकर गलत जानकारी देने को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेखक के बारे मेंप्राची यादवलगभग 19 साल से पत्रकारिता में हैं। सात साल तक एक दिल्ली-एनसीआर न्यूज चैनल में विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। प्रोग्रामिंग और एंकरिंग भी की। टीवी से ही लीगल रिपोर्टिंग की शुरुआत हुई। उस दौरान, जिला अदालतों और दिल्ली हाई कोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट तक की रिपोर्टिंग की। 2013 में नवभारत टाइम्स से जुड़ीं। यहां पर शुरुआत जिला अदालतों, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उपभोक्ता अदालतों की रिपोर्टिंग से हुई। वर्तमान में अन्य सभी अदालतों के साथ दिल्ली हाई कोर्ट भी कवर कर रही हैं।... और पढ़ें
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