साफ इरादे से न्यायालय में आएँ, तथ्य छुपाने पर अंतरिम राहत रद्द – शिमला के निजी होटल के लीजधारक को नहीं मिला समर्थन
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय चाहने वाले को ईमानदारी से पेश होना चाहिए और तथ्य छुपाने पर राहत नहीं दी जा सकती। लीजधारक विक्रम सिंह धीमान द्वारा किराया न देना, सुरक्षा राशि न जमा करना और होटल का कब्जा स्वयं मालकिन को सौंप देना जैसे तथ्य छिपाने के कारण 6 मई 2026 का अंतरिम स्टे ऑर्डर रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह निर्णय मुख्य मुकदमे के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेगा।

सौजन्य से:- ETV Bharat
अदालत से न्याय चाहिए तो साफ इरादे से आएं, तथ्य छिपाने पर शिमला के निजी होटल के लीजधारक की अंतरिम राहत खारिज
कोर्ट ने साफ किया है कि इस आवेदन के निपटारे के दौरान की गई टिप्पणियों का मुख्य मुकदमे के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : October 5, 2026 at 9:51 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक निजी होटल के प्रबंधन और कब्जे से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने शिमला के लक्कड़ बाजार एरिया में स्थित एक निजी होटल के मामले में फैसला देते हुए कहा कि न्याय चाहने वाले को साफ इरादे से न्यायालय में आना चाहिए. हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जो भी पक्षकार न्याय की गुहार लगाता है, उसे साफ इरादे और बिना कोई तथ्य छुपाए अदालत के समक्ष आना चाहिए. हाईकोर्ट ने इस अहम टिप्पणी के साथ मामले में निजी होटल के लीजधारक विक्रम सिंह धीमान की याचिका को खारिज कर दिया. साथ ही उन्हें 6 मई 2026 को दिए गए अंतरिम स्टे ऑर्डर को भी तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया.
मामले के अनुसार, लीजधारक ने होटल की मालकिन और प्रतिवादी जसबीर कुकरेजा के खिलाफ एक सिविल सूट दायर किया था. दोनों पक्षों के बीच 30 जुलाई 2025 को एक लीज एग्रीमेंट हुआ था. उसमें 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2028 तक (3 साल का लॉक-इन पीरियड) 1,66,667 रुपये मासिक किराये पर होटल को पट्टे पर दिया गया था. वादी का आरोप था कि होटल का काम चलने पर मालकिन के मन में लालच आ गया और उन्होंने होटल के कामकाज में दखलअंदाजी शुरू कर दी. साथ ही दो कमरों (कमरा नंबर 301 और 302) पर अवैध कब्जा कर लिया और उनके स्टाफ को धमकाया. वादी के इस बयान पर हाईकोर्ट ने 6 मई 2026 को एक अंतरिम आदेश जारी कर प्रतिवादियों को होटल के काम में दखल देने से रोक दिया था. साथ ही दो कमरों को खाली करने के आदेश दिए थे. फिर मकान मालिक (प्रतिवादी) की ओर से अदालत को बताया गया कि वादी (याचिकाकर्ता) ने अदालत से अंतरिम राहत लेते समय कई महत्वपूर्ण और गंभीर तथ्य छुपाए थे.
अनुबंध के नियमों के अनुसार वादी को 5 लाख, 009 हजार रुपये की रिफंडेबल सिक्योरिटी राशि जमा करानी थी. यह राशि उसने कभी नहीं चुकाई. इसके अलावा, वादी लगातार मासिक किराया चुकाने में चूक कर रहा था. उस पर लाखों रुपये का किराया और जीएसटी की लायबिलिटी बकाया थी. यही नहीं, इसके अलावा प्रतिवादी ने यह भी सबूत पेश किया कि घाटे में चलने के कारण वादी ने खुद ही 10 जून 2026 को स्वेच्छा से होटल का कब्जा मालकिन को सौंप दिया था. अदालत ने दोनों पक्षों के दस्तावेजों, बैंक स्टेटमेंट और चार्टर्ड अकाउंटेंट की ऑडिट रिपोर्ट का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में अदालत से सच छुपाया था.
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि एक पट्टाधारक जो खुद अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है और किराया न चुकाने के अलावा सुरक्षा राशि दबाकर बैठा है, वह मकान मालिक के खिलाफ अदालत से किसी कानूनी संरक्षण की उम्मीद नहीं कर सकता. अदालत ने डे बुक के रिकॉर्ड को देखने के बाद माना कि यदि वादी का इरादा होटल चलाने का होता तो वह चादरें और होटल की अन्य आवश्यक सामग्रियां मकान मालिक को नहीं सौंपता. इससे साबित होता है कि घाटे के कारण कब्जा खुद ही दिया गया था.
अदालत ने माना कि 6 मई 2026 का स्थगन आदेश तथ्यों को छुपाकर और धोखाधड़ी से लिया गया था, जिससे मकान मालिक के मालिकाना हक और व्यावसायिक अधिकारों को भारी नुकसान पहुंच रहा था. कोर्ट ने यह साफ किया कि इस आवेदन के निपटारे के दौरान की गई टिप्पणियों का मुख्य मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह फैसला दोनों पक्षों के साक्ष्यों के आधार पर मेरिट पर होगा. मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की गई है.
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