होमअपराधसुप्रीम कोर्ट ने प्रमुख मामलों में नई व्याख्याएँ दी: धोखे‑से‑सेक्स को अपराध नहीं, उम्र‑सिद्धि न होने पर भी रेप का आरोप लागू, साझेदारी‑संपत्ति का मूल्यांकन तिथि‑आधारित, और 2015‑पूर्व भूमि‑अधिग्रहण में 1894‑एक्ट के तहत ब्याज गणना
अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने प्रमुख मामलों में नई व्याख्याएँ दी: धोखे‑से‑सेक्स को अपराध नहीं, उम्र‑सिद्धि न होने पर भी रेप का आरोप लागू, साझेदारी‑संपत्ति का मूल्यांकन तिथि‑आधारित, और 2015‑पूर्व भूमि‑अधिग्रहण में 1894‑एक्ट के तहत ब्याज गणना

अदालत ने BNS धारा 69 के तहत दर्ज FIR को रद्द किया, यह मानते हुए कि विवाह का झूठा वादा नहीं बल्कि आपसी सहमति पर संबंध बना था, इसलिए धोखे से सेक्स को अपराध नहीं माना गया। साथ ही, पीड़ित की उम्र साबित न हो पाए तो भी आरोपी को IPC धारा 376 के तहत रेप के रूप में दण्डित किया जा सकता है। साझेदारी फर्म के विघटन में हिस्सेदारी की राशि निर्धारित करने के लिए असली मूल्यांकन तिथि को मानदंड माना गया, और NH एक्ट के तहत 2015‑पूर्व मुआवज़े पर ब्याज की गणना 1894 के अधिग्रहण एक्ट के अनुसार की जाएगी।

13 सितंबर 2026 को 04:05 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने प्रमुख मामलों में नई व्याख्याएँ दी: धोखे‑से‑सेक्स को अपराध नहीं, उम्र‑सिद्धि न होने पर भी रेप का आरोप लागू, साझेदारी‑संपत्ति का मूल्यांकन तिथि‑आधारित, और 2015‑पूर्व भूमि‑अधिग्रहण में 1894‑एक्ट के तहत ब्याज गणना

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

13 Sept 2026 9:00 AM IST

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (07 सितंबर, 2026 से 11 सितंबर, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

सुप्रीम कोर्ट ने BNS की धारा 69 के बारे में बताया: शादी का असली वादा तोड़ने पर धोखे से सेक्स का अपराध नहीं बनता

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज FIR रद्द की। इस धारा में धोखे से (जैसे शादी का झूठा वादा करके) सहमति लेकर सेक्स करने को अपराध माना गया।

कोर्ट ने पाया कि शिकायत से ही पता चलता है कि यह धोखे से बहला-फुसलाकर बनाया गया संबंध नहीं, बल्कि आपसी सहमति से बना संबंध था। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी की माँ की इजाज़त न होने के कारण शादी से इनकार करना धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

Case: Kunal Rameshbhai Kalyani v State of Gujarat & Anr.

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

अगर POCSO Act के तहत उम्र साबित न हो पाए तो भी IPC की धारा 376 के तहत रेप का दोषी ठहराया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 सितंबर) को कहा कि अगर अभियोजन पक्ष (Prosecution) पीड़ित की उम्र साबित नहीं कर पाता है - जो POCSO Act के तहत दोषी ठहराने के लिए ज़रूरी है - तो भी आरोपी IPC की धारा 376 के तहत रेप के आरोप से अपने-आप बरी नहीं हो जाता।

कोर्ट ने कहा कि धारा 376 के तहत औपचारिक आरोप न होने पर भी आरोपी को उस प्रावधान के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, क्योंकि यह POCSO Act की धारा 3 जैसा ही अपराध है और दोनों में 'एक्टस रियस' (आपराधिक कृत्य) एक ही है।

Cause Title: PYNCHEMALANGAKI BAREH VERSUS STATE OF MEGHALAYA

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Partnership Act | पार्टनरशिप खत्म होने की तारीख पर नहीं, बल्कि असेसमेंट की तारीख पर तय होगा पार्टनर का हिस्सा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (9 सितंबर) को कहा कि जब पार्टनरशिप खत्म होती है तो पार्टनरशिप की बची हुई संपत्ति में अपने हिस्से को पाने का पार्टनर का अधिकार, पार्टनरशिप खत्म होने की तारीख पर ही तय नहीं हो जाता। इसके बजाय, पार्टनर को पार्टनरशिप की संपत्ति की असल वैल्यूएशन की तारीख पर संपत्ति की वैल्यू के आधार पर अपना हिस्सा पाने का हक है।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जिसमें हैदराबाद में 3.27 एकड़ ज़मीन की मालिक पार्टनरशिप फर्म को पार्टनर ने खत्म करने की मांग की। कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या फर्म की अचल संपत्ति में पार्टनर के हिस्से की वैल्यू 18 अक्टूबर 1983 (पार्टनरशिप खत्म होने की तारीख) के हिसाब से तय की जानी चाहिए, या उस वैल्यू के हिसाब से जो संपत्ति के असल असेसमेंट या बिक्री के समय थी।

Cause Title: V. SUMITRA REDDY & ANR. VERSUS K. RANGANADHA REDDY & ORS.

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

NH Act के तहत भूमि अधिग्रहण के लिए 2015 से पहले के अवॉर्ड्स पर ब्याज की गणना 1894 के एक्ट के अनुसार होगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (08.09.2026) को कहा कि जब नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (NH Act) के तहत सक्षम अधिकारी 01.01.2015 से पहले मुआवज़ा तय करते हैं तो ज़मीन मालिक को दिए जाने वाले सोलेशियम, ब्याज और सोलेशियम पर ब्याज की गणना 'ज़मीन अधिग्रहण एक्ट, 1894' के तहत की जानी चाहिए, न कि 'ज़मीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार एक्ट, 2013' के तहत। बता दें, 01.01.2015 वह तारीख है, जब NH Act के तहत किए गए अधिग्रहण के लिए 2013 का एक्ट लागू किया गया।

Case: Manav Bhanot v National Highway Authority of India

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पति की मौत की तारीख से ही विधवा को मिलनी चाहिए फ़ैमिली पेंशन: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि विधवा को फ़ैमिली पेंशन पाने का अधिकार उसके पति की मौत की तारीख से ही शुरू हो जाता है। इसे उस तारीख तक सीमित नहीं किया जा सकता जब उसने पहली बार सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) में अपील की थी, खासकर तब जब फ़ायदा पाने में हुई देरी उसकी अपनी गलती की वजह से न हो।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच एक रेलवे कर्मचारी की विधवा की अपील पर सुनवाई कर रही थी। कर्मचारी की मौत 2000 में नौकरी के दौरान हुई थी। विधवा ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे फ़ैमिली पेंशन तो दी गई थी, लेकिन उसका फ़ायदा 2000 के बजाय 2014 (जब उसने पहली बार CAT में अपील की थी) से ही दिया गया।

Case: Maya Banerjee v Union of India & Ors

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

बिना किसी अधिकारी का नाम लिए भी कंपनियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (7 सितंबर) को कहा कि किसी कंपनी पर ऐसे अपराध के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है, जिसके लिए 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) ज़रूरी है, भले ही उस कर्मचारी या अधिकारी की पहचान न हुई हो या उसे आरोपी न बनाया गया हो जिसके ज़रिए कथित अपराध किया गया।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि किसी असली व्यक्ति (Natural Person) की पहचान न होने या उसे आरोपी न बनाने के आधार पर ही सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) की धारा 482 के तहत शुरुआती चरण में ही किसी कॉर्पोरेशन के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।

Cause Title: SANOFI INDIA LTD. VERSUS CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान से खिलवाड़ नहीं कर सकते, UGC नियमों से हटना संभव नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों के वेतनमान को लेकर वैधानिक नियमों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों से अलग नहीं जा सकते। अदालत ने कहा कि यूनिवर्सिटी को अपने शिक्षकों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि वे बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान करने की जिम्मेदारी निभाते हैं।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी, हरिद्वार में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त शिक्षक को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय को नियुक्ति की तारीख से संशोधित वेतनमान का लाभ देने और बकाया वेतन छह सप्ताह के भीतर जारी करने का निर्देश दिया।

Powered by Nyaya 247 News

संबंधित ख़बरें

इसी विषय की और ख़बरें →
किराएदार ने खुद को मालिक बताया, दिल्ली हाई कोर्ट ने दलील को खारिज किया
अपराध

किराएदार ने खुद को मालिक बताया, दिल्ली हाई कोर्ट ने दलील को खारिज किया

आगरा के राष्ट्रीय लोक अदालत ने 6.76 लाख मामलों का निपटारा, वादकारियों को मिली राहत
अपराध

आगरा के राष्ट्रीय लोक अदालत ने 6.76 लाख मामलों का निपटारा, वादकारियों को मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने काले हिरण तस्कर को जमानत नहीं दी, 65 किलोग्राम मांस व हथियार बरामद
अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने काले हिरण तस्कर को जमानत नहीं दी, 65 किलोग्राम मांस व हथियार बरामद

बिजली चोरी के 25 साल पुराने केसों को राष्ट्रीय लोक अदालत में निपटाया
अपराध

बिजली चोरी के 25 साल पुराने केसों को राष्ट्रीय लोक अदालत में निपटाया

राष्ट्रीय लोक अदालत में 9,733 मामलों का त्वरित निपटारा, 9.25 करोड़ रुपये का समझौता तय
अपराध

राष्ट्रीय लोक अदालत में 9,733 मामलों का त्वरित निपटारा, 9.25 करोड़ रुपये का समझौता तय

नोएडा लोटस‑300 खरीदारों को मिला पूर्ण स्वामित्व, सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी हटाई
अपराध

नोएडा लोटस‑300 खरीदारों को मिला पूर्ण स्वामित्व, सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी हटाई

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: आईएएस पूजा सिंघल की 18 करोड़ घोटाला याचिका पर होगा फैसला
अपराध

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: आईएएस पूजा सिंघल की 18 करोड़ घोटाला याचिका पर होगा फैसला

रांची में राष्ट्रीय लोक अदालत ने 9.13 लाख प्री‑लिटिगेशन वादों का निपटारा, 367 करोड़ से अधिक का सेटलमेंट
अपराध

रांची में राष्ट्रीय लोक अदालत ने 9.13 लाख प्री‑लिटिगेशन वादों का निपटारा, 367 करोड़ से अधिक का सेटलमेंट

ताज़ा ख़बरें