सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पर लगे पॉक्सो केस को रद्द किया, शारीरिक दंड को यौन अपराध नहीं मानते हुए
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शिक्षक द्वारा अनुशासनात्मक शारीरिक दंड देना पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के अंतर्गत अपराध नहीं है। दो नाबालिग छात्राओं के बयान सुनने के बाद न्यायालय ने शिक्षक के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द कर दिया, यह रेखा स्पष्ट की कि अनुशासन और यौन उत्पीड़न के बीच अंतर है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
छात्राओं को डांटना या शारीरिक दंड देना POCSO का मामला नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक पर दर्ज केस किया रद्द
अदालत ने कहा कि किसी शिक्षक का गलत फैसला या अनुचित शारीरिक दंड, अपने आप में पॉक्सो कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता.
By Sumit Saxena
Published : September 12, 2026 at 5:36 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा के अनुशासन और यौन दुर्व्यवहार के बीच एक स्पष्ट और मजबूत रेखा खींची है. अदालत ने कहा कि किसी शिक्षक का गलत फैसला या अनुचित शारीरिक दंड, अपने आप में पॉक्सो कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता. दो नाबालिग लड़कियों को पीटने के आरोपी एक स्कूल शिक्षक के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को रद्द कर दिया.
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की बेंच ने 8 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा, "एक शिक्षक के रूप में अपीलकर्ता का व्यवहार भले ही सही न रहा हो, खासकर शारीरिक दंड देना और छात्राओं के साथ संवेदनशीलता न दिखाना. लेकिन, दोनों छात्राओं के बयानों को ध्यान से पढ़ने के बाद, निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि उसने पॉक्सो एक्ट की धारा 10 के तहत कोई यौन अपराध किया है."
बेंच ने कहा कि जब दो छात्राओं ने क्लास में ध्यान नहीं दिया और अपनी जियोग्राफी की मैप बुक नहीं लाईं, तो शिक्षक इस स्थिति को और अधिक संवेदनशीलता से संभाल सकते थे. बेंच ने स्पष्ट किया, "लेकिन जैसा कि ऊपर बताया गया है, अपीलकर्ता की तरफ से कोई कमी होना या शारीरिक दंड देना, पॉक्सो एक्ट की धारा 10 के दायरे में नहीं आएगा."
बेंच ने आगे कहा कि किसी गर्ल्स स्कूल या को-एड स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक के लिए, इस तरह का आरोप या मुकदमा झेलना एक तरह से उसे जिंदगी भर के लिए दोषी ठहराने जैसा है. इससे न सिर्फ उसका पूरा करियर बर्बाद हो जाता है, बल्कि उसकी निजी जिंदगी पर भी इसका गहरा असर पड़ता है.
अदालत ने कहा कि उस शिक्षक का अपना एक परिवार भी है. ऐसे में किसी शिक्षक पर छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाना, उसके लिए मौत की घंटी जैसा साबित होगा. बेंच ने कहा, "मुकदमे के अंत में यदि वह बेगुनाह भी साबित हो जाता है, तो भी वह सम्मान वापस नहीं मिल पाएगा. पॉक्सो एक्ट के तहत चलने वाले कड़े आपराधिक मुकदमे के कारण उसे जो भारी नुकसान पहले ही हो चुका है, उसकी भरपाई अंत में मिलने वाली बेगुनाही से कभी नहीं हो सकती."
बेंच ने कहा कि यद्यपि अपीलकर्ता को कम उम्र के बच्चों, विशेषकर छात्राओं से व्यवहार करते समय निश्चित रूप से अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है, लेकिन इसे पॉक्सो एक्ट जैसी सख्त कानूनी धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का आधार नहीं बनाया जा सकता.
अदालत ने कहा कि पुलिस की कहानी पर शक करने की और भी वजहें हैं. खासकर एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी और जिस तरीके से स्कूल के हेडमास्टर व महिला शिक्षिकाओं ने आरोपी शिक्षक के खिलाफ यह आपराधिक मामला शुरू कराया.
बेंच ने कहा, "आखिरकार, उनके (हेडमास्टर व शिक्षिकाओं के) बयान सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं. ऐसे हालातों में, हमारा यह मानना है कि इस आपराधिक मुकदमे को आगे जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और आरोपी शिक्षक के साथ घोर नाइंसाफी होगी."
सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणियां पश्चिम बंगाल के एक स्कूल शिक्षक के खिलाफ दर्ज पॉक्सो केस को रद्द करते हुए कीं. उस शिक्षक पर आरोप था कि जब भूगोल की क्लास में दो नाबालिग छात्राएं सवालों के जवाब नहीं दे पाईं, तो उसने उनकी पीठ और कमर पर डंडे से पिटाई कर दी थी.
राज्य सरकार के वकील ने अदालत का ध्यान एफआईआर, काउंसलिंग-सह-जांच रिपोर्ट और शुरुआती जानकारी की ओर खींचा. उन्होंने दलील दी कि इनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नाबालिग छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय शिक्षक की नीयत यौन उत्पीड़न की थी. वकील ने तर्क दिया कि इस मोड़ पर कानूनी कार्यवाही को रद्द करना जल्दबाजी होगी. क्योंकि न केवल दोनों छात्राओं ने, बल्कि स्कूल की महिला शिक्षिकाओं और हेडमास्टर ने भी आरोपी शिक्षक के व्यवहार को लेकर यही बात कही थी.
काउंसलिंग-सह-जांच रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों के अलावा, शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि यह शिक्षक द्वारा छात्राओं को गलत तरीके से छूने का मामला था. इसके साथ ही, तीन अन्य छात्राओं ने आरोप लगाया कि भले ही शिक्षक ने उन्हें नहीं छुआ, लेकिन उसने उन्हें गलत तरीके से देखा जिससे वे असहज महसूस कर रही थीं.
इस मामले में आखिरकार जुलाई 2025 में पॉक्सो एक्ट की धारा 10 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जो गंभीर यौन उत्पीड़न से संबंधित है. सुप्रीम कोर्ट ने इस साल अप्रैल में कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को खारिज कर दिया और विशेष अदालत (विशेष पॉक्सो कोर्ट) में लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया.
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