किराएदार ने खुद को मालिक बताया, दिल्ली हाई कोर्ट ने दलील को खारिज किया
मोहम्मद महबूब ने 1992 के रजिस्टर्ड सेल डीड के बाद 20 रुपये मासिक किराए पर दी गई जगह को अपनी संपत्ति मानते हुए दलील दी, पर कोर्ट ने उसे अनधिकृत कब्जेदार घोषित कर दलील को खारिज कर दिया। 20 रुपये के किराए के बावजूद किराया न लेने की दलील को अदालत ने अमान्य ठहराया और प्रॉपर्टी खाली करने का आदेश बरकरार रखा।

सौजन्य से:- Navbharat Times
20 रुपये महीना तय था किराया
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 7 सितंबर को अहाता किदारा, बाड़ा हिंदू राव स्थित प्रॉपर्टी के मामले में मो. महबूब की नियमित दूसरी अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही उसके खिलाफ प्रॉपर्टी खाली करने का आदेश भी बरकरार रहा। यह विवाद उस समय शुरू हुआ, जब प्रॉपर्टी का मालिकाना हक रखने वाली अर्शी कुरैशी और इरम ने बेदखली का मुकदमा दायर किया। उन्होंने बताया कि प्रॉपर्टी 1992 में रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी गई थी। महबूब के पिता अल्लाह रक्खा को मूलरूप से 20 रुपये महीने के किराए पर जगह दी गई थी।किराया नहीं लेने की दलील खारिज
किराया नहीं देने और बिना अनुमति स्ट्रक्चर में बदलाव पर विवाद हुआ। मालिकों ने किराएदारी खत्म करने के लिए कानूनी नोटिस भेजा। मामला कोर्ट पहुंचा तो महबूब ने नया दावा कर दिया। कहा कि इतने सालों तक किराया नहीं लिया गया, इसलिए वह प्रॉपर्टी का मालिक बन गया है। कोर्ट ने इस दलील को उसके खिलाफ ही माना।किराएदार के अधिकार भी खत्म
कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 111 (8) के तहत किराएदार द्वारा मकान मालिक के मालिकाना हक से इनकार करने पर किराएदारी के अधिकार खत्म हो जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि महबूब ने खुद को किराएदार मानने से इनकार कर दिया था। इसलिए वह अनधिकृत कब्जेदार की स्थिति में आ गया और सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।चिन्मय कृष्ण दास का Video शेयर कर बरसे शहजाद पूनावाला
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