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दिल्ली हाई कोर्ट ने तथ्य छिपाकर जमानत प्राप्त करने वाले आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की

हाई कोर्ट ने आरोपी द्वारा मुख्य तथ्य छुपाकर ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत लेने के बाद उसकी अग्रिम जमानत याचिका को अस्वीकार कर दिया। न्यायाधीश ने जांच अधिकारी और ट्रायल कोर्ट के सरकारी वकील के आचरण की जांच का आदेश दिया और संबंधित अधिकारियों को आदेश की प्रतियां भेजी।

12 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
दिल्ली हाई कोर्ट ने तथ्य छिपाकर जमानत प्राप्त करने वाले आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की

सौजन्य से:- Navbharat Times

तथ्य छिपाकर ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत हासिल करने के मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।

नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसे मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसमें अदालत के सामने अहम तथ्य छिपाने की बात सामने आई। आरोपी ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका लंबित होने के बावजूद ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत हासिल कर ली। हाई कोर्ट को इसकी जानकारी बाद में हुई।

क्या था पूरा मामला

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) और ट्रायल कोर्ट के असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (APP) के आचरण की जांच के आदेश दिए हैं। मामला लक्ष्मी नगर थाने में दर्ज FIR नंबर 800037855/2026 से जुड़ा है। FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 305 के तहत दर्ज हुई थी। रॉबिन जैन की ओर से वकील अभिषेक पांडे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। राज्य की ओर से एडिशनल पीपी अमित अहलावत और IO/SI सचिन शर्मा मौजूद थे।

पहले ही गिरफ्तार हो चुका आरोपी

सुनवाई के दौरान पुलिस ने बताया कि आरोपी को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था। उसे 24 जुलाई 2026 को ट्रायल मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। उसे दो दिन की पुलिस रिमांड में रखा गया। इसके बाद 27 जुलाई को मैजिस्ट्रेट ने उसे नियमित जमानत दे दी।

अंतरिम सुरक्षा देने से किया इनकार

मामले में पेच यहीं सामने आया। हाई कोर्ट में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पहले से लंबित थी। लेकिन मैजिस्ट्रेट को इसकी जानकारी नहीं दी गई। यह भी नहीं बताया गया कि हाई कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा देने से इनकार किया था।

किसी ने भी मैजिस्ट्रेट के सामने नहीं रखी जानकारी

10 सितंबर को पारित कोर्ट के आदेश के मुताबिक, आरोपी, उसके वकील, IO और ट्रायल कोर्ट के सरकारी वकील में से किसी ने भी यह महत्वपूर्ण जानकारी मैजिस्ट्रेट के सामने नहीं रखी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बारे में सवाल उठाए। आरोपी की ओर से पेश वकील भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सके कि मैजिस्ट्रेट को हाई कोर्ट की कार्यवाही और वहां की टिप्पणियों की जानकारी नहीं दी गई थी।

कोर्ट ने खारिज याचिका

कोर्ट ने कहा कि जरूरी तथ्यों को छिपाने के बाद ट्रायल कोर्ट से नियमित जमानत मिल जाने के कारण अब अग्रिम जमानत की याचिका पर राहत देने का सवाल नहीं उठता। लिहाजा याचिका खारिज कर दी गई। हाई कोर्ट ने आदेश की कॉपी संबंधित मैजिस्ट्रेट को भेजने का निर्देश दिया। साथ ही IO के आचरण की जांच के लिए संबंधित DCP और APP के आचरण की जांच के लिए डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन को आदेश की कॉपी भेजने को कहा।

लेखक के बारे मेंप्राची यादवलगभग 19 साल से पत्रकारिता में हैं। सात साल तक एक दिल्ली-एनसीआर न्यूज चैनल में विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। प्रोग्रामिंग और एंकरिंग भी की। टीवी से ही लीगल रिपोर्टिंग की शुरुआत हुई। उस दौरान, जिला अदालतों और दिल्ली हाई कोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट तक की रिपोर्टिंग की। 2013 में नवभारत टाइम्स से जुड़ीं। यहां पर शुरुआत जिला अदालतों, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उपभोक्ता अदालतों की रिपोर्टिंग से हुई। वर्तमान में अन्य सभी अदालतों के साथ दिल्ली हाई कोर्ट भी कवर कर रही हैं।... और पढ़ें

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