सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लिव-इन पार्टनर में शादीशुदा महिलाओं का फर्क नहीं रहेगा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लिव-इन पार्टनर में शादीशुदा महिलाओं का फर्क नहीं रहेगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि शादीशुदा महिला और लिव-इन पार्टनर दोनों को क्रूरता से सुरक्षा मिलेगी।

सौजन्य से:- ABP News
Xप्लेन: क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शादीशुदा और लिव-इन पार्टनर में कोई फर्क नहीं?
Live-in Relationship Cruelty: IPC की जगह अब भारतीय न्याय सहिंता (BNS) लागू हो चुकी है. IPC की धारा 498A की जगह BNS की धारा 85 और 86 हैं. कोर्ट के इस फैसले का असर BNS की इन्हीं धाराओं पर भी होगा.
सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी तौर पर एक नई पहचान दी. 3 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पुरुष किसी महिला के साथ 'शादी जैसे रिश्ते' में रह रहा है, तो उस पर IPC की धारा 498A (क्रूरता से जुड़ी धारा) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. अब सिर्फ शादीशुदा महिलाओं को ही नहीं, बल्कि लिव-इन पार्टनर को भी क्रूरता से सुरक्षा मिलेगी. यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया. कोर्ट ने कहा कि 'लिव-इन रिलेशनशिप आज एक हकीकत है' और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आखिर इस फैसले के बाद बिना शादी के साथ रहने पर क्या-क्या बदल जाएगा...
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे कहानी क्या है?
यह फैसला कर्नाटक के एक मामले से जुड़ा है. यहां एक महिला ने अपने पार्टनर लोकेश बी.एच. के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी. महिला का आरोप था कि:
- लोकेश ने उससे अपनी पहली शादी के बारे में छिपाया
- उसने और उसके परिवार ने महिला को दहेज के लिए परेशान किया
- उन्होंने महिला को शारीरिक नुकसान पहुंचाया
लोकेश ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि उनकी कोई कानूनी शादी नहीं हुई है, इसलिए धारा 498A उन पर लागू नहीं होनी चाहिए. हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद लोकेश सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर एक बड़ा सवाल उठाया कि क्या सिर्फ शादीशुदा महिलाओं को ही क्रूरता से सुरक्षा मिलनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट का मुख्य तर्क: 'भेदभाव क्यों?'
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे अहम सवाल पूछा, 'अगर एक महिला को अपने पति/पार्टनर या उसके परिवार से क्रूरता झेलनी पड़ती है, तो उसे सुरक्षा देने में फर्क क्यों किया जाए?'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'क्रूरता यह नहीं देखती कि वह किस घर में दाखिल हो रही है. चाहे वह शादीशुदा महिला का घर हो या न हो. एक बार दाखिल होने के बाद, उसकी तबाही मचाने की प्रवृत्ति और बढ़ जाती है.'
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शादीशुदा महिला और शादी जैसे रिश्ते में रहने वाली महिला के बीच क्रूरता से सुरक्षा के मामले में फर्क करना असंवैधानिक है. यह आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.
77 पन्नों का फैसला और सामाजिक बदलाव
अपने 77 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने समाज में आए बदलावों को भी बताते हुए कहा, 'शादी से पहले साथ रहना अब अनसुना या अस्वीकार्य नहीं रह गया है. ठीक उसी तरह, जैसे समलैंगिक संबंधों को, अब अपराध की कैटेगरी से बाहर कर दिया गया है और उन्हें प्राकृतिक माना गया है.' कोर्ट ने यह भी कहा, 'विवाह को पवित्र माना जाता था, जो निस्संदेह अब एक बदलती हुई व्यवस्था है.'
फैसले की तीन शर्तें: हर लिव-इन पर नहीं लागू
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला हर लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होगा. इसके लिए तीन शर्तें जरूरी हैं:
- 'शादी जैसा रिश्ता': सिर्फ कोई भी लिव-इन रिलेशनशिप नहीं, बल्कि वह जो शादी जैसा हो. यानी, एक गंभीर, लंबे समय तक चलने वाला रिश्ता, जिसमें दोनों साथ रह रहे हों और एक-दूसरे की जिम्मेदारी उठा रहे हों.
- शादी का इरादा: रिश्ते में शादी करने का इरादा साफ होना चाहिए. यानी, दोनों पार्टनर्स का एक-दूसरे से शादी करने का संकल्प हो.
- सबूत का भार महिला पर: यह साबित करने की जिम्मेदारी महिला पर होगी कि उनके रिश्ते में शादी का इरादा था.
सरकार का तर्क और कोर्ट का जवाब
केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि लिव-इन पार्टनर्स को पहले से ही पोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 के तहत सुरक्षा मिलती है. इस वजह से धारा 498A का दायरा बढ़ाने की जरूरत है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि:
- DV Act एक सिविल कानून है, जो मुख्य रूप से मुआवजा, रहने का अधिकार और सुरक्षा आदेश जैसी राहत देता है.
- धारा 498A एक आपराधिक कानून है, जिसमें तीन साल तक की सजा का प्रावधान है.
- दोनों कानून अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं.
इस धारा का BNS में क्या होगा?
IPC की जगह अब भारतीय न्याय सहिंता (BNS) लागू हो चुकी है. IPC की धारा 498A की जगह BNS की धारा 85 और 86 हैं. कोर्ट के इस फैसले का असर BNS की इन्हीं धाराओं पर भी होगा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कानून का दुरुपयोग न हो. कोर्ट ने आदेश दिया कि:
- अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन हो
- किसी भी आरोपी को बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ्तार नहीं किया जाएगा
कोर्ट ने यह भी माना कि धारा 498A का दुरुपयोग होता रहा है. कनविक्शन रेट सिर्फ 15% है, जबकि चार्जशीटिंग रेट 93.6% है.
रिश्तों की बदलती परिभाषा क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी तौर पर शादी के करीब ला दिया है. कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि क्रूरता के खिलाफ सुरक्षा किसी के भी साथ भेदभाव नहीं कर सकती है. चाहे वह शादीशुदा हो या लिव-इन में हो. इसके लिए:
- लिव-इन रिलेशनशिप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह आज की सामाजिक वास्तविकता है.
- 'शादी जैसे रिश्ते' में महिला को शादीशुदा महिला के बराबर सुरक्षा मिलेगी.
- शादी का इरादा होना जरूरी है.
- DV Act से आपराधिक सुरक्षा नहीं मिलती, इसलिए 498A/BNS की जरूरत है.
- गिरफ्तारी से पहले जांच अनिवार्य होगी.
क्रूरता, किसी भी तरह, दरवाजे पर नहीं रुकती. चाहे वह घर किसी शादीशुदा महिला का हो या न हो. यह फैसला भारतीय समाज में बदलते रिश्तों को कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम है. हालांकि, इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कोर्ट ने सख्त दिशा-निर्देश भी दिए हैं.
अब देखना यह होगा कि इस फैसले का असर आने वाले समय में कितना गहरा पड़ता है. क्या यह महिलाओं को सशक्त बनाता है, या फिर कानूनी विवादों को बढ़ाता है.
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