बाल मजदूरी पर दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त रुख, आपसी समझौते से नहीं हो सकता मामला खत्म
दिल्ली हाई कोर्ट ने बाल मजदूरी को सामाजिक बुराई बताया और कहा कि इस तरह के गंभीर अपराध आपसी समझौते से समाप्त नहीं किए जा सकते, कोर्ट ने 11 साल पुराने मामले की FIR रद्द करने से इनकार कर दिया।

सौजन्य से:- नवभारत टाइम्स
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बाल मजदूरी और शोषण जैसे गंभीर अपराध केवल आपसी समझौते के आधार पर खत्म नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने करीब 11 साल पुराने मामले की FIR रद्द करने से इनकार कर दिया।
नई दिल्लीः बाल मजदूरी को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि यह महज दो पक्षों के बीच का निजी विवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बुराई है, जिसके दूरगामी परिणाम होते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि पीड़ित बच्चे और आरोपियों के बीच समझौता हो जाने से बाल मजदूरी और शोषण जैसे गंभीर अपराध की आपराधिक कार्यवाही खत्म नहीं की जा सकती। जस्टिस गिरीश कठपालिया ने अमित भसीन और अन्य बनाम दिल्ली सरकार मामले में 4 अगस्त को यह टिप्पणी करते हुए करीब 11 साल पुराने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया।
2015 की FIR में बाल मजदूरी और शोषण के आरोप
मामला कीर्ति नगर थाने में 2015 में दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपियों पर IPC की धारा 323 और 374, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 23 और बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम की धारा 3/14 के तहत केस दर्ज हुआ था। आरोपियों ने हाई कोर्ट में कहा कि पीड़ित बच्चे के साथ समझौता हो चुका है, इसलिए FIR रद्द कर दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि वह इस स्तर पर 'मिनी ट्रायल' नहीं कर सकता। आरोप पहले ही तय हो चुके हैं और उन्हें चुनौती भी नहीं दी गई थी। इतना ही नहीं, ट्रायल आगे बढ़ चुका है और पीड़ित बच्चे की गवाही भी बतौर गवाह दर्ज हो चुकी है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नरिंदर सिंह बनाम पंजाब सरकार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे विशेष कानूनों के तहत आने वाले अपराध, जिनका समाज पर गंभीर असर होता है, सामान्य तौर पर आपसी समझौते के आधार पर खत्म नहीं किए जा सकते।
लेखक के बारे मेंप्राची यादवलगभग 19 साल से पत्रकारिता में हैं। सात साल तक एक दिल्ली-एनसीआर न्यूज चैनल में विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। प्रोग्रामिंग और एंकरिंग भी की। टीवी से ही लीगल रिपोर्टिंग की शुरुआत हुई। उस दौरान, जिला अदालतों और दिल्ली हाई कोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट तक की रिपोर्टिंग की। 2013 में नवभारत टाइम्स से जुड़ीं। यहां पर शुरुआत जिला अदालतों, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उपभोक्ता अदालतों की रिपोर्टिंग से हुई। वर्तमान में अन्य सभी अदालतों के साथ दिल्ली हाई कोर्ट भी कवर कर रही हैं।... और पढ़ें
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