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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल, स्वतंत्रता की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने चुनाव आयोग के कामकाज और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पद्धति पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान लाखों मतदाताओं के मतदान अधिकार से वंचित होने के मुद्दे को उजागर किया और सवाल किया कि जब नियुक्ति सरकार के हाथ में हो तो आयोग की निष्पक्षता कैसे बनी रहेगी।

4 अक्टूबर 2026 को 07:05 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए सवाल, स्वतंत्रता की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की

सौजन्य से:- amarujala.com

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सीईसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने जताई चिंता: पूछा- नियुक्ति सरकार करेगी तो कैसे रहेगी निष्पक्षता?

Sun, 04 Oct 2026 11:55 PM IST

निर्मल कांत

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजकोट (गुजरात)

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजकोट (गुजरात)

Published by: निर्मल कांत

Updated Sun, 04 Oct 2026 11:55 PM IST

सार

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने निर्वाचन आयोग के कामकाज और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के अधिकार से वंचित होने का भी जिक्र किया। उन्होंने पूछा- जब नियुक्ति सरकार के हाथ में है तो आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता कैसे बचेगी? पढ़िए रिपोर्ट

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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भारत के चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने यह चिंता मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के वोट के अधिकार से वंचित होने के मामले को लेकर जताई।

उन्होंने उन रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि कई महत्वपूर्ण फैसले मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने लिए। इन फैसलों में बाकी दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।

जस्टिस नरीमन ने कहा, आप ऐसा निर्वाचन आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करे या गलत तरीके से काम करे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के वोट के अधिकार से वंचित किए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया।

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सरकार के हाथ में नियुक्ति तो स्वतंत्रता कैसे बचेगी?

जस्टिस नरीमन ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की पूरी जिम्मेदारी उस समय की सरकार के हाथ में होने को 'लाल झंडी' बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे वोट देने का अधिकार बहुत बड़े खतरे में पड़ गया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम (सीईसी एक्ट) की वैधता पर जल्द से जल्द फैसला करना चाहिए। जस्टिस नरीमन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच के बंटे हुए फैसले पर भी निराशा जताई।

उन्होंने कहा कि इस वजह से सरकार ऐसी प्रक्रिया के तहत नियुक्तियां जारी रख सकी, जिसमें कार्यपालिका का काफी प्रभाव है। जस्टिस नरीमन राजकोट के राजकुमार कॉलेज में 'संविधान और आम आदमी' विषय पर बोल रहे थे।

उन्होंने 2023 के अनूप बरनवाल मामले को याद किया। उन्होंने कहा कि उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी व्यवस्था के तौर पर आदेश दिया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति एक समिति करे। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया था।

फिर बदली नियुक्ति की व्यवस्था क्यों?

लेकिन इसके तुरंत बाद सरकार ने 2023 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम बनाया। इस कानून ने मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटा दिया। उनकी जगह प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल कर दिया गया।

जस्टिस नरीमन ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने के तरीके से ही हटाया जा सकता है। इससे उनका कार्यकाल सुरक्षित रहता है। उन्होंने कहा कि यह उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किया गया उपाय था।

इसके बाद उन्होंने कहा, अगर निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति उस समय की सरकार के हाथ में है, तो उन्हें हटाने की प्रक्रिया उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता में बहुत ज्यादा योगदान नहीं देती।

दो जजों की राय अलग तो नियुक्तियां कैसे जारी रहीं?

जस्टिस नरीमन ने कहा, अब दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह पूरा मामला हाल ही में कोर्ट के सामने आया। दो विद्वान जजों की राय अलग-अलग थी। अब अंतिम स्थिति यह है कि मामला एक बेंच के सामने चला गया है, संभवतः पांच जजों की बेंच के सामने, ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह कानून सही है या सही कानून नहीं है। लेकिन इस बीच ये नियुक्तियां अभी भी सिर्फ उस समय की सरकार के हाथ में हैं।

एसआईआर क्यों नहीं रुका?

उन्होंने कहा, अब हमने हाल ही में ऐसा होने का खतरा देखा है। आप सभी ने देखा है कि पश्चिम बंगाल के चुनावों में 90 लाख मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यह एक हैरान कर देने वाला आंकड़ा है। 90 लाख मतदाताओं का वोट देने का अधिकार छिन जाना भी किसी तरह सुप्रीम कोर्ट को इतना प्रभावित नहीं कर सका कि वह इसे रोक दे।

ये भी पढ़ें: खरगे की टिप्पणी पर सियासी घमासान: रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष से पूछा सवाल- क्या राहुल गांधी हैं अवैध सांसद?

22 लाख ने अपील की, 93% फैसले पक्ष में क्यों?

उन्होंने कहा, जिन लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया, उनमें से करीब 22 लाख मतदाताओं ने वास्तव में अपील की। बाकी लोग ऐसे होने चाहिए जिनके पास साधन या न्याय तक पहुंच नहीं है और इन 22 लाख मतदाताओं में से करीब 1 लाख मतदाताओं की अपील पर फैसला हुआ। इनमें 93 प्रतिशत फैसले मतदाताओं के पक्ष में गए।

'तो आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पूरी तरह गैरकानूनी था। आम आदमी, भारत के नागरिक को इस तरह बाहर कर दिया गया, ताकि एक सरकार वह हासिल कर सके जो वह चाहती है' और पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि इसने उस समय की सरकार को हटा दिया और केंद्र की सरकार को लेकर आया। अब, ये बहुत-बहुत परेशान करने वाली चीजें हैं जो आज हमारे देश में हो रही हैं'।

दो आयुक्तों ने आपत्ति की तो अधिकार क्यों नहीं इस्तेमाल किया?

जस्टिस नरीमन ने आगे इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से लिए गए कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने सवाल किया कि अगर दोनों सदस्यों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसले पर आपत्ति थी, तो उन्होंने 2023 के कानून की धारा 18 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। इस धारा के तहत निर्वाचन आयोग में दो-तिहाई बहुमत से लिया गया फैसला लागू हो सकता है।

जस्टिस नरीमन ने कहा, उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे भी मौजूदा सरकार द्वारा नियुक्त किए गए थे। तो आज हमारे पास क्या है? आज का अखबार हमें बताता है कि इन तीनों सज्जनों के बीच कुछ समझौता हो गया है। यह देश के लिए बहुत बड़ा नुकसान है। वे एक साझा बयान लेकर सामने आए हैं। इसमें कहा गया है कि हां, आप लोगों ने जो कुछ आपत्तियां उठाई थीं, वे सही लगती हैं। हम पुराने फॉर्म 6 पर वापस जाएंगे, वगैरह-वगैरह..। इसलिए आज हमारे संविधान के तहत आम आदमी और अगर मैं ऐसा कह सकता हूं, संविधान का दिल और लोकतंत्र का दिल, जो वोट देने का अधिकार है, बहुत बड़े खतरे में है।

अब सुप्रीम कोर्ट से क्या उम्मीद?

जस्टिस नरीमन ने कहा कि उन्हें उम्मीद और भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट इस स्थिति के मुताबिक कदम उठाएगा। उन्होंने कहा, मुझे उम्मीद है कि शीर्ष अदालत और वह संस्था तुरंत कदम उठाएगी और इन चीजों को ठीक करेगी, जिसका मैं कभी हिस्सा था। आप ऐसा निर्वाचन आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करे या गलत तरीके से काम करे। इसलिए संविधान और आम आदमी के संबंध में पहला अहम रेड फ्लैग निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया है।

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उन्होंने उन रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि कई महत्वपूर्ण फैसले मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने लिए। इन फैसलों में बाकी दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।

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जस्टिस नरीमन ने कहा, आप ऐसा निर्वाचन आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करे या गलत तरीके से काम करे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि पश्चिम बंगाल में 90 लाख मतदाताओं के वोट के अधिकार से वंचित किए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया।

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सरकार के हाथ में नियुक्ति तो स्वतंत्रता कैसे बचेगी?

जस्टिस नरीमन ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की पूरी जिम्मेदारी उस समय की सरकार के हाथ में होने को 'लाल झंडी' बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे वोट देने का अधिकार बहुत बड़े खतरे में पड़ गया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम (सीईसी एक्ट) की वैधता पर जल्द से जल्द फैसला करना चाहिए। जस्टिस नरीमन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच के बंटे हुए फैसले पर भी निराशा जताई।

उन्होंने कहा कि इस वजह से सरकार ऐसी प्रक्रिया के तहत नियुक्तियां जारी रख सकी, जिसमें कार्यपालिका का काफी प्रभाव है। जस्टिस नरीमन राजकोट के राजकुमार कॉलेज में 'संविधान और आम आदमी' विषय पर बोल रहे थे।

उन्होंने 2023 के अनूप बरनवाल मामले को याद किया। उन्होंने कहा कि उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी व्यवस्था के तौर पर आदेश दिया था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति एक समिति करे। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया था।

फिर बदली नियुक्ति की व्यवस्था क्यों?

लेकिन इसके तुरंत बाद सरकार ने 2023 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम बनाया। इस कानून ने मुख्य न्यायाधीश को समिति से हटा दिया। उनकी जगह प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल कर दिया गया।

जस्टिस नरीमन ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को हटाने के तरीके से ही हटाया जा सकता है। इससे उनका कार्यकाल सुरक्षित रहता है। उन्होंने कहा कि यह उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किया गया उपाय था।

इसके बाद उन्होंने कहा, अगर निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति उस समय की सरकार के हाथ में है, तो उन्हें हटाने की प्रक्रिया उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता में बहुत ज्यादा योगदान नहीं देती।

दो जजों की राय अलग तो नियुक्तियां कैसे जारी रहीं?

जस्टिस नरीमन ने कहा, अब दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह पूरा मामला हाल ही में कोर्ट के सामने आया। दो विद्वान जजों की राय अलग-अलग थी। अब अंतिम स्थिति यह है कि मामला एक बेंच के सामने चला गया है, संभवतः पांच जजों की बेंच के सामने, ताकि यह पता लगाया जा सके कि यह कानून सही है या सही कानून नहीं है। लेकिन इस बीच ये नियुक्तियां अभी भी सिर्फ उस समय की सरकार के हाथ में हैं।

एसआईआर क्यों नहीं रुका?

उन्होंने कहा, अब हमने हाल ही में ऐसा होने का खतरा देखा है। आप सभी ने देखा है कि पश्चिम बंगाल के चुनावों में 90 लाख मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यह एक हैरान कर देने वाला आंकड़ा है। 90 लाख मतदाताओं का वोट देने का अधिकार छिन जाना भी किसी तरह सुप्रीम कोर्ट को इतना प्रभावित नहीं कर सका कि वह इसे रोक दे।

ये भी पढ़ें: खरगे की टिप्पणी पर सियासी घमासान: रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष से पूछा सवाल- क्या राहुल गांधी हैं अवैध सांसद?

22 लाख ने अपील की, 93% फैसले पक्ष में क्यों?

उन्होंने कहा, जिन लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया, उनमें से करीब 22 लाख मतदाताओं ने वास्तव में अपील की। बाकी लोग ऐसे होने चाहिए जिनके पास साधन या न्याय तक पहुंच नहीं है और इन 22 लाख मतदाताओं में से करीब 1 लाख मतदाताओं की अपील पर फैसला हुआ। इनमें 93 प्रतिशत फैसले मतदाताओं के पक्ष में गए।

'तो आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पूरी तरह गैरकानूनी था। आम आदमी, भारत के नागरिक को इस तरह बाहर कर दिया गया, ताकि एक सरकार वह हासिल कर सके जो वह चाहती है' और पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि इसने उस समय की सरकार को हटा दिया और केंद्र की सरकार को लेकर आया। अब, ये बहुत-बहुत परेशान करने वाली चीजें हैं जो आज हमारे देश में हो रही हैं'।

दो आयुक्तों ने आपत्ति की तो अधिकार क्यों नहीं इस्तेमाल किया?

जस्टिस नरीमन ने आगे इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दो निर्वाचन आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त की ओर से लिए गए कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने सवाल किया कि अगर दोनों सदस्यों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के फैसले पर आपत्ति थी, तो उन्होंने 2023 के कानून की धारा 18 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। इस धारा के तहत निर्वाचन आयोग में दो-तिहाई बहुमत से लिया गया फैसला लागू हो सकता है।

जस्टिस नरीमन ने कहा, उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे भी मौजूदा सरकार द्वारा नियुक्त किए गए थे। तो आज हमारे पास क्या है? आज का अखबार हमें बताता है कि इन तीनों सज्जनों के बीच कुछ समझौता हो गया है। यह देश के लिए बहुत बड़ा नुकसान है। वे एक साझा बयान लेकर सामने आए हैं। इसमें कहा गया है कि हां, आप लोगों ने जो कुछ आपत्तियां उठाई थीं, वे सही लगती हैं। हम पुराने फॉर्म 6 पर वापस जाएंगे, वगैरह-वगैरह..। इसलिए आज हमारे संविधान के तहत आम आदमी और अगर मैं ऐसा कह सकता हूं, संविधान का दिल और लोकतंत्र का दिल, जो वोट देने का अधिकार है, बहुत बड़े खतरे में है।

अब सुप्रीम कोर्ट से क्या उम्मीद?

जस्टिस नरीमन ने कहा कि उन्हें उम्मीद और भरोसा है कि सुप्रीम कोर्ट इस स्थिति के मुताबिक कदम उठाएगा। उन्होंने कहा, मुझे उम्मीद है कि शीर्ष अदालत और वह संस्था तुरंत कदम उठाएगी और इन चीजों को ठीक करेगी, जिसका मैं कभी हिस्सा था। आप ऐसा निर्वाचन आयोग नहीं रख सकते जो इस तरह काम करे या गलत तरीके से काम करे। इसलिए संविधान और आम आदमी के संबंध में पहला अहम रेड फ्लैग निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया है।

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