हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव टालने और प्रधानों को प्रशासक बनाने के आदेश को नकारा, कहा-निर्वाचन आयोग को व्यापार नहीं है चुनाव करना
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को टालने और प्रधानों को प्रशासक कार्यकाल बढ़ाने के आदेशों पर सख्ती से कार्रवाई करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग को चुनाव संपन्न कराने का व्यापार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि 2000 में प्रेम लाल पटेल के मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने धारा 12(3-ए) को असंवैधानिक घोषित किया है, लेकिन फिर भी सरकार लंबे समय से इसे लागू कर रही है. कोर्ट ने राज्य सरकार को आखिरी मौका देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है और अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तारीख लगाई है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
पंचायत चुनाव टालने और प्रधानों को प्रशासक बनाने पर हाईकोर्ट सख्त, कहा-दोनों आदेश संविधान के विपरीत
कोर्ट ने कहा-संविधान के अनुच्छेद 243ई के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निश्चित.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : June 26, 2026 at 7:14 PM IST
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को टालने और प्रधानों का बतौर प्रशासक कार्यकाल बढ़ाने के आदेशों पर असंतोष जताया है. कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243ई के तहत पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए निश्चित है और किसी भी हाल में पांच साल खत्म होने से पहले अगले चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए. राज्य सरकार कोई अध्यादेश या कानून लाकर चुनाव को पांच साल से आगे नहीं बढ़ा सकती. कोर्ट ने कहा कि सरकार के दोनों आदेश संविधान के विपरीत हैं, इसलिए ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. याचिका में राज्य सरकार के गत 25 व 26 मई के उन आदेशों को चुनौती दी गई है, जिसके तहत यूपी पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12(3-ए) का हवाला देकर चुनाव टाल दिए गए और प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी गई है. सुनवाई के दौरान ने कोर्ट को बताया गया कि वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल के मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक करार दे चुकी है.
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है और 10 जून को मतदाता सूची भी प्रकाशित की जा चुकी है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा जरूरी व्यवस्थाएं न मिलने के कारण चुनाव कराने में बाधा आ रही है. राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के क्रम में ओबीसी आरक्षण की स्थिति तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया है. जब तक आयोग की रिपोर्ट नहीं आती, तब तक ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्यों के चुनाव नहीं कराए जा सकते.
इस पर कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि काफी समय बीतने के बाद भी ओबीसी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं सौंपी है. कोर्ट ने याची को ओबीसी कमीशन को भी इस मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी. साथ ही प्रदेश सरकार को आखिरी मौका देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. सरकार को कोर्ट के सामने स्पष्ट रूप से वह समयसीमा बतानी होगी कि चुनाव कब तक संपन्न कराए जाएंगे.
कोर्ट ने कहा कि सरकार अगली तारीख तक स्पष्ट समयसीमा और ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट पेश नहीं करती है तो प्रमुख सचिव पंचायती राज को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा. उन्हें व्यक्तिगत हलफनामे में यह जवाब देना होगा कि जब हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच इस कानून को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी थी, तो उन्होंने किस आधार पर यह आदेश जारी किया? ऐसा न करने पर इसे प्रथमदृष्टया कोर्ट के आदेश की अवमानना माना जाएगा. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तारीख लगाई है.
यह भी पढ़ें: एपीओ भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा परिणाम में माइग्रेशन की मांग वाली अपील खारिज
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