केरल हाईकोर्ट ने फिर से शपथ लेने का आदेश दिया, जानें क्यों
केरल हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधियों के लिए निजी आस्था को पीछे रखते हुए कानून का पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने तर्क दिया कि जब कानून में शपथ का निश्चित प्रारूप दिया जाता है, तो फिर दिक्कत होनी चाहिए, और प्रारूप का अक्षरशः पालन करना जरूरी है। अदालत ने कहा कि शपथ केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में जनता के प्रति सार्वजनिक वचन है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
तय प्रारूप से अलग शपथ स्वीकार नहीं
मामला तिरुवनंतपुरम नगर निगम से जुड़ा है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम के जीते हुए 20 भाजपा पार्षदों और पलक्कड़ जिले की वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत के एक कांग्रेस सदस्य की शपथ को अमान्य घोषित कर दिया गया है। केरल हाईकोर्ट ने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की शपथ को कानूनी नजरिए से पूरी तरह गलत ठहराया है। भाजपा पार्षदों ने शपथ में विभिन्न देवी-देवताओं, भारत माता, राजनीतिक शहीदों और अन्य प्रतीकों का उल्लेख किया था। जबकि कांग्रेस सदस्य ने पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी का नाम लेकर शपथ ली थी। अदालत ने कहा कि ऐसा करना वैधानिक शपथ के स्वरूप में बदलाव है। इसलिए सभी संबंधित प्रतिनिधियों को दोबारा विधिसम्मत तरीके से शपथ लेने का निर्देश दिया गया।राम मंदिर चढ़ावा विवाद: BNS की किन गंभीर धाराओं में दर्ज हुई F.I.R, नही बच पाएंगे दोषी, जानें क्या होगी सजा
कानून में जैसा प्रारूप, वैसी ही शपथ जरूरी
मामले की सुनवाई में न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा कि जब किसी कानून में शपथ का निश्चित प्रारूप दिया गया है तो फिर क्या दिक्कत है? प्रारूप का अक्षरशः पालन करना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्वाचित प्रतिनिधि केवल ईश्वर के नाम पर शपथ ले सकते हैं या फिर बिना ईश्वर का उल्लेख किए सत्यनिष्ठा की प्रतिज्ञा कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त किसी विशेष देवता, धार्मिक प्रतीक, राजनीतिक नेता, संगठन या शहीद का नाम जोड़ने की अनुमति कानून नहीं देता। अदालत ने कहा कि यदि इस तरह की छूट दी गई तो भविष्य में शपथ के अनगिनत अलग-अलग स्वरूप सामने आ सकते हैं, जिससे कानून की एकरूपता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने सबको नए सिरे से शपथ लेने का निर्देश दिया।लोकतंत्र में शपथ केवल औपचारिकता नहीं, संवैधानिक जिम्मेदारी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शपथ केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतंत्र में जनता के प्रति सार्वजनिक वचन है। निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ लेकर यह भरोसा देते हैं कि वे संविधान, कानून और विधि के शासन का पालन करेंगे। इसलिए शपथ का स्वरूप सभी के लिए समान होना चाहिए। सार्वजनिक पद ग्रहण करते समय कानून को ही सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए'हमें भी दो अनुसूचित जाति का दर्जा और सुविधाएं', इलाहाबाद हाईकोर्ट में SC में शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज, पर क्यों
अदालत ने प्रशासनिक फैसलों को सुरक्षित रखा
फिर उठा सवाल कि क्या इस दौरान ऐसे प्रतिनिधियों के लिए गए फैसले भी रद्द होंगे? हाईकोर्ट ने इस मामले साफ किया किया कि जिन प्रतिनिधियों की शपथ अमान्य घोषित की गई है, उनके अब तक किए गए प्रशासनिक कार्य और निर्णय स्वतः निरस्त नहीं होंगे। अदालत ने प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से पहले किए गए कार्यों को सुरक्षित रखा। लेकिन एक महीने के अंदर सबको फिर से शपथ ले लेने की सख्त हिदायत दी।10000000 रुपयों का सोना बारिश में गल गया, बाकी बंदर ले भागे, पुलिसिया दलील सुन कर जज साहब ने माथा पीट लिया
लोकतांत्रिक व्यवस्था की समानता, निष्पक्षता और वैधानिकता सर्वोपरि
- यह एक शपथ विवाद तक सीमित नहीं है बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों और विधि के शासन को मजबूत करने वाला निर्णय है।
- सार्वजनिक पद की शपथ व्यक्तिगत श्रद्धा, राजनीतिक विचार या किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान का माध्यम नहीं बन सकती।
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