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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जिला जज की शीघ्र सुनवाई की मांग को खारिज, पद के आधार पर कोई प्राथमिकता नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद के पूर्व जिला जज राकेश कुमार नैन की पेंडिंग रिट याचिका की त्वरित सुनवाई की माँग को अस्वीकार कर दिया, यह कहकर कि संविधान समान न्याय तक पहुंच का अधिकार देता है और किसी को उसके पूर्व पद के कारण विशेषाधिकार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने व्यक्तिगत आधार पर अवसरवादी दखल से बचने की चेतावनी दी, जबकि नैन को भ्रष्टाचार के आरोप में सेवा से बर्खास्त किया गया था।

1 अक्टूबर 2026 को 05:05 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जिला जज की शीघ्र सुनवाई की मांग को खारिज, पद के आधार पर कोई प्राथमिकता नहीं

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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हमारे लिए बस कंडक्टर-प्रिंसिपल सेक्रेटरी दोनों बराबर:सुप्रीम कोर्ट बोला- आप जज हैं, इसलिए प्राथमकिता नहीं दे सकते; पूर्व जिला जज की जल्द सुनवाई की मांग खारिज

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इलाहाबाद के पूर्व जिला जज की जल्द सुनवाई की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पद के आधार पर किसी को प्राथमिकता नहीं मिल सकती। संविधान हर व्यक्ति को समान रूप से न्याय तक पहुंच का अधिकार देता है।

याचिका पूर्व जज राकेश कुमार नैन ने लगाई थी। जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेंडिंग रिट याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई थी। जस्टिस नैन को सेवा से बर्खास्त कर दियाग गया है।

हालांकि सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने उन्हें हाईकोर्ट में ही जल्दी सुनवाई की मांग रखने की छूट दी।

भ्रष्टाचार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था

राकेश कुमार नैन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले स्पेशल जज थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने उन्हें न्यायिक कदाचार और भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी पाया था।

इसके बाद नैन को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उन्होंने बर्खास्तगी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। यह याचिका अब भी पेंडिंग है।

सुनवाई में देरी से परेशान होकर नैन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। बेंच ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया।

बेंच की 3 टिप्पणियां…

- अगर देरी के बेहद गंभीर आरोप नहीं हैं, तो सिर्फ पूर्व न्यायिक अधिकारी होने के कारण याचिकाकर्ता के प्रति ‘गलत सहानुभूति’ नहीं दिखाई जा सकती।

- मौजूदा बेंच ‘अवसरवादी दखल’ रोकने की पूरी कोशिश करेगी। यह दलील संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

- हर नागरिक को उसके पद या स्थिति की परवाह किए बिना न्याय तक पहुंच का अधिकार है। संवैधानिक समानता के इस क्षेत्र में कोर्ट व्यक्तिगत आधार पर किसी के लिए अलग हस्तक्षेप नहीं करेगा।

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