सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प सरकार की जमानत‑बिना हिरासत नीति पर दांव लगाया
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन की ऐसी आव्रजन नीति की समीक्षा करने को मंजूरी दी है, जिसमें प्रवासियों को जमानत सुनवाई के बिना हिरासत में रखा जाता है। अधिकांश संघीय न्यायालयों ने इसे कानून का उल्लंघन माना है, जबकि कुछ सर्किट ने इसके विपरीत निर्णय दिया है, जिससे सरकार का कार्यान्वयन प्रभावित हो रहा है। एसीएलयू द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए प्रवासियों ने इस नीति को चुनौती देने के लिए कई याचिकाएं दायर की हैं।

सौजन्य से:- Hindustan
ट्रंप प्रशासन की हिरासत नीति की समीक्षा करेगा सुप्रीम कोर्ट
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीति की समीक्षा पर सहमति जताई है। इस नीति के तहत प्रवासियों को जमानत सुनवाई के बिना हिरासत में रखा जाता है। संघीय अदालतों के अधिकांश न्यायाधीशों ने इसे कानून का उल्लंघन बताया है, जबकि कुछ ने इसके विपरीत निर्णय दिया है। इस पर विवाद जारी है।
वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ट्रंप प्रशासन की उस आव्रजन नीति की समीक्षा करने पर सहमति जताई, जिसके तहत प्रवासियों को जमानत पर सुनवाई का अवसर दिए बिना हिरासत में रखा जा रहा है। यह मामला प्रशासन की व्यापक आव्रजन कार्रवाई के बीच आया है। संघीय अदालतों के 11 में से नौ सर्किट के न्यायाधीशों ने माना कि जमानत पर सुनवाई के बिना प्रवासियों को हिरासत में रखना संघीय कानून का उल्लंघन है। हालांकि, पांचवें और आठवें सर्किट ने इसके विपरीत फैसला सुनाया है। इन अदालतों के अनुसार अवैध रूप से अमेरिका में प्रवेश करने और वहां रहने के आरोपों का सामना कर रहे प्रवासियों को निर्वासन संबंधी मामलों की सुनवाई लंबित रहने तक हिरासत में रखा जाना चाहिए।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के वकीलों का कहना है कि अलग-अलग सर्किट के फैसलों में विरोधाभास से आव्रजन कानून का व्यवस्थित क्रियान्वयन प्रभावित हो रहा है। उनके मुताबिक सरकार की कानूनी व्याख्या को चुनौती देते हुए प्रवासियों ने हजारों याचिकाएं दायर की हैं, जिससे अदालतों पर काम का बोझ बढ़ा है। ट्रंप प्रशासन के वकीलों ने दलील दी कि मौजूदा स्थिति में कुछ क्षेत्रों में बिना वैध प्रवेश अनुमति के मौजूद प्रवासियों को अनिवार्य रूप से हिरासत में रखा जा रहा है, जबकि अन्य क्षेत्रों में उन्हें जमानत पर सुनवाई का अवसर मिल रहा है। मामले में याचिकाकर्ता प्रवासियों का प्रतिनिधित्व अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (एसीएलयू) कर रहा है।
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