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बिना सूचना के पीठ परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट में जजों की तीखी प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट में मामलों को पूर्व सूचना के बिना एक बेंच से दूसरी विशेष बेंच में स्थानांतरित करने पर जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस उज्जल भुइयां सहित कई जजों ने कड़ी निंदा की। उन्होंने इस कदम को न्याय प्रणाली की पारदर्शिता को नुकसान पहुँचाने वाला बताया और बेंच बदलने पर पुराने फैसलों को पलटने की प्रवृत्ति को संविधान के अनुच्छेद 141 के खिलाफ कहा। भविष्य के चीफ जस्टिस बी वी नागरतन ने भी इस प्रथा पर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई।

1 अक्टूबर 2026 को 06:04 am बजे
बिना सूचना के पीठ परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट में जजों की तीखी प्रतिक्रिया

सौजन्य से:- aajtak.in

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सुप्रीम कोर्ट में बिना सूचना के मुकदमों की सुनवाई करने वाली पीठ बदलने और नए जजों की पीठ द्वारा पुराने फैसलों को पलटने को लेकर कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा काफी गर्म है.

इस विषय पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग जजों की पीठ और कॉलेजियम स्तर पर भी गंभीर आपत्तियां उठाई जा चुकी हैं. मूल पीठ को बिना बताए स्पेशल बेंच में केस ट्रांसफर करने पर रजिस्ट्री को कड़ी फटकार लगाई गई.

जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की विशेष पीठ ने रजिस्ट्री की क्लास लगाई. दरअसल, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल यानी सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में पहले से सुनवाई कर रही नियमित बेंच में जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल चंदुरकर के यहां से हटाकर बिना किसी पूर्व सूचना के अन्य स्पेशल बेंच के सामने लिस्ट कर दिया गया था.

यह भी पढ़ें: दिल्ली में पटाखों पर नहीं लगेगा पूरा बैन, SC ने कहा लोगों की भावनाएं और पर्यावरण दोनों का रखा जाएगा ध्यान

वहां जस्टिस भुइयां सहयोगी जज हैं. इस पर जजों ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह पिछले दरवाजे से मामलों को दूसरी बेंच में शिफ्ट करना न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर सीधा शक पैदा करता है.

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कोर्ट ने रजिस्ट्री से पूछा कि मुख्य बेंच को भरोसे में लिए बिना या बिना बताए मामले को इस तरह कैसे ट्रांसफर किया जा सकता है? जज बदलते ही फैसला बदलने की प्रवृत्ति यानी बेंच हॉपिंग पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस बात को लेकर भी बहस छिड़ी हुई है कि जब किसी मामले में जजों की बेंच बदलती है, तो नए जज पिछले जजों के स्थापित कानूनी फैसलों को आसानी से पलट देते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 141 के उल्लंघन का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत के जजों जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने टिप्पणी की है कि जजों की बेंच बदलने पर पुराने फैसलों को दोबारा खोलना या पलटना संविधान के अनुच्छेद 141 की मूल भावना के खिलाफ है. इस अनुच्छेद के तहत सुप्रीम कोर्ट का आदेश देश का कानून होता है.

भावी चीफ जस्टिस बी वी नागरत्ना ने भी इस प्रवृत्ति पर आपत्ति जताते हुए सार्वजनिक रूप से इस बात पर चिंता जताई थी कि चेहरे बदलने से अदालती फैसले नहीं बदलने चाहिए. अगर किसी कानून या फैसले पर संदेह है, तो स्थापित नियम के तहत उसे केवल बड़ी बेंच के पास सुनवाई के लिए ही भेजना उपाय है, न कि बराबर की बेंच द्वारा सीधे खारिज किया जाना.

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