कपिल सिब्बल ने 'वन नेशन‑वन इलेक्शन' विधेयकों पर सुप्रीम कोर्ट दौरे को असंवैधानिक बताया
राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने कहा कि संसद द्वारा प्रस्तावित विधेयकों पर न्यायाधीशों के साथ चर्चा करना शक्ति विभाजन के विरुद्ध है और संवैधानिक वैधता का निर्धारण केवल अदालत का कार्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी बातचीत भविष्य में न्यायिक समीक्षा को जटिल बना सकती है। समिति अध्यक्ष ने सदस्यों की उपलब्धता न मिलने के कारण दौरे को स्थगित कर दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
निर्दलीय राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने प्रस्तावित दौरे पर आपत्ति जताते हुए इसे असंवैधानिक और शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा के विपरीत बताया था।
सिब्बल ने समिति दौरे पर उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने कहा कि उन्होंने कभी किसी संसदीय समिति को ऐसे प्रस्तावित कानून पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ बातचीत करते नहीं देखा, जिसे बाद में अदालत में न्यायिक निर्णय के लिए लाया जा सकता है। उन्होंने कहा, मैंने अपने लीगल करियर में कभी ऐसा नहीं सुना है। यह असंवैधानिक है।उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि जिस कानून को बाद में उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, उसी के बारे में न्यायाधीशों को यह बताना उचित नहीं है कि कानून कितना अच्छा है।
'कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना अदालत का दायित्व'
उन्होंने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, 'सरकार न्यायाधीशों को बता रही है कि कानून कितना अच्छा है। यही वह कानून है, जिसके खिलाफ याचिका दायर की जाएगी और उच्चतम न्यायालय तय करेगा कि याचिका वैध है या नहीं तथा कानून को रद्द किया जाना चाहिए या बरकरार रखा जाना चाहिए।' निर्दलीय राज्यसभा सदस्य ने कहा कि कानून बनाना संसद का अधिकार है और कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना अदालत का दायित्व।समिति ने दौरा किया रद्द
वहीं समिति के अध्यक्ष पी पी चौधरी ने बताया, समिति के सदस्यों की तारीखें मेल नहीं खाने के कारण दौरा स्थगित किया गया है। उन्होंने कहा, मेरे पास भी कुछ अन्य प्रतिबद्धताएं हैं।सूत्रों का कहना है कि सांसद ने तर्क दिया था कि विधेयक की संवैधानिक वैधता या उसके गुण-दोष पर भारत के प्रधान न्यायाधीश या अन्य मौजूदा न्यायाधीशों के साथ बातचीत करना शक्तियों के पृथक्करण तथा संसद और न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े कर सकता है।
सदस्य ने यह भी कहा कि कानून बनाने और उस पर विचार करने में विधायिका की भूमिका तथा उसकी वैधता पर फैसला करने में न्यायपालिका की भूमिका अलग-अलग रहनी चाहिए। ऐसे विधेयक पर मौजूदा न्यायाधीशों की राय लेना दोनों संस्थाओं के बीच अनावश्यक टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है, जो भविष्य में न्यायिक समीक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय के समक्ष आ सकता है।
संयुक्त समिति संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विचार कर रही है। इन विधेयकों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए रूपरेखा प्रदान करने का प्रस्ताव है। दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे और बाद में जांच के लिए संयुक्त समिति को भेजे गए थे।
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