भूपेश बघेल को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, पाटन सीट पर चुनाव याचिका में दखल से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राहत देने से इनकार कर दिया है, अदालत ने पाटन विधानसभा सीट से उनके 2023 के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। हालांकि, उन्हें हाईकोर्ट में अपने तर्क रखने की अनुमति है।

सौजन्य से:- अमर उजाला
सी. जी. समाचार: पाटन सीट पर फंसे भूपेश बघेल! सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल से किया इनकार
शुक्र, 07 अगस्त 2026 06:13 अपराह्न भारतीय समय
बिलासपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिलासपुर
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प्रकाशितकर्ता: बिलासपुर ब्यूरो
अद्यतन किया गया शुक्र, 07 अगस्त 2026 06:13 अपराह्न भारतीय समय
सार
छत्तीसगढ़ समाचार: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने पाटन विधानसभा सीट से 2023 में उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने के हाईकोर्ट के फैसले में दखल नहीं दिया।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें 2023 में पाटन विधानसभा सीट से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने से इनकार किया गया था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि बघेल सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष अपने सभी तर्क और दलीलें रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
CJI की बेंच ने बघेल की याचिका का किया निपटारा
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बघेल की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव याचिका को कारण-ए-दावा नहीं होने और कानूनी आवश्यकताओं का पालन नहीं करने के आधार पर खारिज करने की बघेल की अर्जी को ठुकरा दिया था।
‘सभी दलीलें चुनाव न्यायाधिकरण के सामने रखने की छूट’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बघेल के पास बचाव के लिए तर्क मौजूद हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी चुनौती खारिज किए जाने से चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही के दौरान सभी बिंदुओं और दलीलों को उठाने के उनके अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
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'चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं'
बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। वकील सुमीर सोढ़ी की सहायता से सिब्बल ने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को समाप्त हो गया था और बघेल कथित तौर पर 16 नवंबर को एक धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे। याचिकाकर्ता ने इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (आर. पी. ए.) की धारा 126 का उल्लंघन बताया है।
‘धारा 126 का उल्लंघन भ्रष्ट आचरण नहीं’
सिब्बल ने कहा कि आरोपों को स्वीकार करने के बावजूद धारा 126 का उल्लंघन केवल चुनावी अपराध हो सकता है, इसे अधिनियम की धारा 123(7) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि कथित तौर पर मौन अवधि शुरू होने के बाद बघेल ने रैली या रोड शो किया था, जिसे धारा 126 और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया गया है।
‘क्या कथित उल्लंघन से चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ?’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह भी देखा जाना है कि कथित उल्लंघन से चुनाव का परिणाम ‘महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित’ हुआ या नहीं। सिब्बल ने कहा कि यह तथ्यात्मक सवाल है और याचिकाकर्ता के अनुसार भी कार्यक्रम में करीब 200 लोग ही शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि बघेल करीब 20 हजार मतों के अंतर से चुनाव जीते थे, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि कथित सभा ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया।
बघेल ने 48 घंटे की प्रचार रोक अवधि के उल्लंघन से किया इनकार
वकील सुमीर सोढ़ी के माध्यम से दायर याचिका में बघेल ने आर. पी. ए. की धारा 126 के तहत 48 घंटे की प्रचार मौन अवधि के उल्लंघन के आरोप से इनकार किया है। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज करने से इनकार कर गलती की। बघेल ने दावा किया कि याचिका में पर्याप्त तथ्य नहीं हैं, आरोप अस्पष्ट और अनुमान आधारित हैं तथा आर. पी. ए. की धारा 83 के तहत आवश्यक हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।
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CJI की बेंच ने बघेल की याचिका का किया निपटारा
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बघेल की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव याचिका को कारण-ए-दावा नहीं होने और कानूनी आवश्यकताओं का पालन नहीं करने के आधार पर खारिज करने की बघेल की अर्जी को ठुकरा दिया था।
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‘सभी दलीलें चुनाव न्यायाधिकरण के सामने रखने की छूट’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बघेल के पास बचाव के लिए तर्क मौजूद हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी चुनौती खारिज किए जाने से चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही के दौरान सभी बिंदुओं और दलीलों को उठाने के उनके अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
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'चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं'
बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। वकील सुमीर सोढ़ी की सहायता से सिब्बल ने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को समाप्त हो गया था और बघेल कथित तौर पर 16 नवंबर को एक धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे। याचिकाकर्ता ने इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (आर. पी. ए.) की धारा 126 का उल्लंघन बताया है।
‘धारा 126 का उल्लंघन भ्रष्ट आचरण नहीं’
सिब्बल ने कहा कि आरोपों को स्वीकार करने के बावजूद धारा 126 का उल्लंघन केवल चुनावी अपराध हो सकता है, इसे अधिनियम की धारा 123(7) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि कथित तौर पर मौन अवधि शुरू होने के बाद बघेल ने रैली या रोड शो किया था, जिसे धारा 126 और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया गया है।
‘क्या कथित उल्लंघन से चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ?’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह भी देखा जाना है कि कथित उल्लंघन से चुनाव का परिणाम ‘महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित’ हुआ या नहीं। सिब्बल ने कहा कि यह तथ्यात्मक सवाल है और याचिकाकर्ता के अनुसार भी कार्यक्रम में करीब 200 लोग ही शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि बघेल करीब 20 हजार मतों के अंतर से चुनाव जीते थे, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि कथित सभा ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया।
बघेल ने 48 घंटे की प्रचार रोक अवधि के उल्लंघन से किया इनकार
वकील सुमीर सोढ़ी के माध्यम से दायर याचिका में बघेल ने आर. पी. ए. की धारा 126 के तहत 48 घंटे की प्रचार मौन अवधि के उल्लंघन के आरोप से इनकार किया है। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज करने से इनकार कर गलती की। बघेल ने दावा किया कि याचिका में पर्याप्त तथ्य नहीं हैं, आरोप अस्पष्ट और अनुमान आधारित हैं तथा आर. पी. ए. की धारा 83 के तहत आवश्यक हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।
न्याय 247 न्यूज़ द्वारा प्रस्तुत
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