सुप्रीम कोर्ट की ई‑कमेटी को V‑कोर्ट्स पोर्टल में बिना जुर्म कबूल किए ट्रैफिक जुर्माना निपटारे की अनुमति देने वाली याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह द्वारा दायर याचिका पर विचार किया, जिसमें V‑कोर्ट्स पोर्टल को इस तरह बदलने की मांग की गई कि नागरिक ट्रैफिक उल्लंघनों को भुगतान करके बिना प्ली ऑफ गिल्ट के निपटा सकें। याचिकाकर्ता ने पोर्टल में मौजूद ‘डार्क पैटर्न’ और कन्फ्यूजिंग इंटरफ़ेस को दोषसिद्धि का कारण बतलाते हुए सुधार का अनुरोध किया, तथा बेनेटॉन मामले के हाई कोर्ट के निर्देशों को लागू करने की भी मांग की।

सौजन्य से:- hindi.livelaw.in
सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी V-कोर्ट्स पोर्टल पर बिना जुर्म कबूल किए ट्रैफिक अपराधों के निपटारे की अनुमति देने वाली याचिका पर करेगी विचार
Shahadat
2 Sept 2026 10:32 AM IST
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपनी ई-कमेटी को एक याचिका भेजी। इस याचिका में कमेटी द्वारा मैनेज किए जाने वाले V-कोर्ट्स पोर्टल में बदलाव की मांग की गई ताकि नागरिकों को ट्रैफिक अपराधों का निपटारा करते समय जुर्म कबूल करने (प्ली ऑफ गिल्ट) की ज़रूरत न पड़े।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह (याचिकाकर्ता प्रभजोत सिंह ढिल्लों की ओर से) की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। आदेश में कहा गया कि उठाया गया मुद्दा V-कोर्ट्स पोर्टल के बेहतर कामकाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
यह याचिका ढिल्लों ने AoR प्रभास बजाज के ज़रिए दायर की। इसमें सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी को V-कोर्ट्स पोर्टल (जिसे ई-कमेटी मैनेज करती है) को अपडेट करने का निर्देश देने की मांग की गई, ताकि अपराधों के निपटारे के लिए एक स्पष्ट और स्वतंत्र विकल्प शामिल किया जा सके, जिसमें यूज़र को जुर्म कबूल करने की ज़रूरत न हो।
याचिका में आरोप लगाया गया कि पोर्टल में 'डार्क पैटर्न' और कन्फ्यूजिंग इंटरफेस है, जो जुर्माना भरने को गलत तरीके से जुर्म कबूलने के बराबर मानता है, जिसके परिणामस्वरूप कंपाउंडेबल अपराधों के लिए दोषसिद्धि (कनविक्शन) हो जाती है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि V-कोर्ट्स पोर्टल इस तरह से काम कर रहा था, जो इसके उद्देश्य - यानी नागरिक-अनुकूल तरीके से ट्रैफिक चालानों का तेज़ी से निपटारा - में बाधा डाल रहा था। यह आग्रह किया गया कि यह सिस्टम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है, क्योंकि यह उन्हें बिना जानकारी, समझ या सूचित सहमति के ट्रैफिक अपराधों का निपटारा करते समय "जुर्म कबूलने" के लिए मजबूर करता है।
याचिकाकर्ता ने ज़ोर दिया कि V-कोर्ट्स वेबसाइट पर कुछ अपराधों का निपटारा करते समय नागरिक अनजाने में जुर्म कबूल कर रहे हैं, जिससे उन्हें परिणामों की जानकारी के बिना दोषी ठहराया जा रहा है।
याचिका में बेनेटॉन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली राज्य (NCT) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी से V-कोर्ट्स पोर्टल में कुछ बदलाव करने का अनुरोध किया गया। इन बदलावों में जुर्माना भरकर अपराधों के निपटारे का विकल्प शामिल है (ताकि लोक अदालत का इंतज़ार न करना पड़े) और यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे भुगतान दोषसिद्धि का रिकॉर्ड न बनें।
इस आदेश का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने ई-कमेटी से बेनेटॉन मामले में हाई कोर्ट की सिफारिशों पर कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की। याचिका में यह भी मांग की गई कि ट्रैफिक से जुड़ी शिकायतों को दूर करने के लिए ACP या कोई अन्य अधिकृत अधिकारी तय दिनों और समय पर पुलिस स्टेशनों में मौजूद रहे। एक और मांग यह है कि दिल्ली ट्रैफिक पुलिस एक भरोसेमंद और वेरिफ़ाई करने लायक सिस्टम बनाए, ताकि यह पक्का किया जा सके कि गाड़ी मालिकों को कानून के मुताबिक 15 दिनों के अंदर कथित उल्लंघनों के बारे में सूचना मिल जाए।
Case : PRABHJOT SINGH DHILLON Versus E -COMMITEE SUPREME COURT OF INDIA AND ANR. Diary No. 31698-2026
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