सुप्रीम कोर्ट ने 3‑महीने की सीमा तय की, फिर फैसला देने में दो साल लगाए
सुप्रीम कोर्ट ने सैनॉफ़ी इंडिया के खिलाफ सीबीआई की जांच से जुड़े मामले में 15 मई 2024 को सुरक्षित रखा हुआ फैसला दो साल से अधिक समय बाद सुनाया, जबकि तीन महीने पहले उसने उच्च न्यायालयों को सुरक्षित फैसलों को तीन महीने में सुनाने की समयसीमा निर्धारित की थी। न्यायालय ने जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ द्वारा कंपनी के खिलाफ केस को रद्द करने से इनकार किया और निर्णय में बताया कि कंपनी को आपराधिक ज़िम्मेदारी तभी दी जा सकती है जब उसके कार्यों में स्पष्ट अपराधीय मंशा हो।

सौजन्य से:- Hindustan
जिस सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की समयसीमा तय की, उसी ने फैसला सुनाने में लगा दिए 2 साल
सुप्रीम कोर्ट ने सैनोफी इंडिया से जुड़े मामले में दो साल से अधिक समय बाद फैसला सुनाया। खास बात यह है कि तीन महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के लिए सुरक्षित फैसले सुनाने की अधिकतम तीन महीने की समयसीमा तय की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाने में दो साल से अधिक समय लिया है। खास बात यह है कि करीब तीन महीने पहले खुद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट समेत अन्य संवैधानिक अदालतों में सुरक्षित रखे गए फैसलों को सुनाने के लिए अधिकतम तीन महीने की समयसीमा तय की थी।
यह मामला दवा कंपनी सैनोफी इंडिया लिमिटेड से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सोमवार को कंपनी के खिलाफ सीबीआई की भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की जांच से जुड़े मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया।
मई 2024 में सुरक्षित रखा गया था फैसला
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई 2024 को सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सैनोफी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू पेश हुए थे। फैसला सोमवार को सुनाया गया। इस तरह फैसला सुरक्षित रखे जाने और सुनाए जाने के बीच दो साल से अधिक का समय बीत गया।
यह मामला सात साल से अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। सुप्रीम कोर्ट के 2019 के आदेश के बाद बेंगलुरु की सीबीआई अदालत में चल रही कार्यवाही पर भी इतने समय से रोक लगी हुई थी।
सैनोफी के खिलाफ किस मामले में सुनाया फैसला?
मामला मैसूरु स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के लिए दवाओं की खरीद में कथित अनियमितताओं से जुड़ा है। इसमें सरकार को कथित तौर पर 3.53 लाख रुपये का नुकसान होने की बात कही गई थी।
99 पन्नों के फैसले में पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कंपनी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए किन परिस्थितियों में उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि कंपनी एक कानूनी इकाई होने के बावजूद अभियोजन का सामना कर सकती है। इसके लिए कंपनी के कामकाज के लिए जिम्मेदार किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान या उसे आरोपी बनाना हर स्थिति में जरूरी नहीं है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल यह आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी कंपनी ने अपराध किया या उसमें आपराधिक मंशा थी।
आरोपों से प्रथम दृष्टया यह सामने आना चाहिए कि:
- किसी व्यक्ति या व्यक्तियों ने कंपनी की ओर से कार्रवाई की थी।
- वह कार्रवाई संबंधित अपराध से जुड़ी थी।
- आसपास की परिस्थितियां ऐसी नहीं थीं कि आपराधिक मंशा का होना स्पष्ट रूप से असंगत या पूरी तरह असंभव लगे।
तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने तय की थी समयसीमा
इस फैसले का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 29 मई को सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट में मामलों के निपटारे और सुरक्षित फैसलों को सुनाने के लिए व्यापक समयसीमा तय की थी।
उस फैसले में कहा गया था कि हाईकोर्ट को फैसला सुरक्षित रखे जाने की तारीख से अधिकतम तीन महीने के भीतर कारण सहित फैसला सुनाने का प्रयास करना चाहिए।
अगर कोई फैसला तीन महीने से अधिक समय तक लंबित रहता है तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को इसकी जानकारी संबंधित चीफ जस्टिस के सामने रखनी होगी। चीफ जस्टिस पीठ को दो अतिरिक्त सप्ताह के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दे सकते हैं।
अगर इसके बाद भी फैसला लंबित रहता है तो चीफ जस्टिस मामले को किसी दूसरी पीठ के पास नए सिरे से सुनवाई और निपटारे के लिए भेज सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों तय की थी यह समयसीमा?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ये निर्देश दिए थे। अदालत ने ऐसे कई आपराधिक अपीलों का जिक्र किया था, जिनमें उम्रकैद की सजा पाए लोगों से जुड़े मामले भी शामिल थे और जिनमें फैसले वर्षों तक सुरक्षित रहे थे।
पीठ ने कहा था कि न्यायिक देरी को पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर उन मामलों में जहां किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल हो।
सुप्रीम कोर्ट में पहले भी सामने आ चुकी है ऐसी देरी
फैसला लंबे समय तक सुरक्षित रखने का यह अकेला मामला नहीं है। इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट की कम से कम तीन अन्य पीठों ने ऐसे फैसले सुनाए थे जो 11 महीने या उससे अधिक समय से सुरक्षित थे। इससे पता चलता है कि फैसले सुनाने में देरी की समस्या सिर्फ हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट करीब दो दशक पहले भी इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। अनिल राय बनाम बिहार राज्य मामले में 2001 में अदालत ने कुछ हाईकोर्ट जजों की उस प्रथा पर ध्यान दिया था, जिसमें फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे सुनाने में देरी होती थी। कुछ मामलों में केवल फैसले का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया जाता था और विस्तृत कारण बाद में देने की बात कही जाती थी।
तब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी देरी रोकने के लिए सुरक्षा उपाय तय किए थे। अदालत ने कहा था कि अगर कोई फैसला छह महीने से अधिक समय तक सुरक्षित रहता है तो पक्षकार संबंधित चीफ जस्टिस के सामने आवेदन देकर मामले को दूसरी पीठ के सामने नए सिरे से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कराने का अनुरोध कर सकते हैं।
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