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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: विदेश में लापता भारतीय की जाँच का कानूनी आधार क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने यूक्रेन के ब्लैक सी में ड्रोन हमले से लापता भारतीय दीपक कुमार गुप्ता के मामले में केंद्र की कानूनी जिम्मेदारी पर सवाल उठाए, यह जानने के लिये कि विदेशी संप्रभु क्षेत्र में जांच भारतीय कानून के तहत किस प्रावधान से की जा सकती है। कोर्ट ने बताया कि बिना संबंधित देश की अनुमति दिल्ली पुलिस को वहाँ भेजना संभव नहीं है और परिवारों को उपलब्ध मुआवजा व बीमा दावे हासिल करने पर भी ध्यान देना चाहिए।

8 सितंबर 2026 को 05:32 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा: विदेश में लापता भारतीय की जाँच का कानूनी आधार क्या?

सौजन्य से:- Navbharat Times

Case status of Supreme Court : यूक्रेन के ब्लैक सी में ड्रोन हमले के बाद लापता भारतीय के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। मामले में CJI सूर्यकांत ने पूछा कि विदेश में जांच का कानूनी आधार क्या है? केंद्र सरकार की क्या कानूनी बाध्यता है ?

नई दिल्ली : यूक्रेन के पास ब्लैक सी का क्षेत्र रूस के साथ जारी युद्ध की वजह से काफी खतरे भरा हो गया है। पिछले दिनों इस समुद्र क्षेत्र में कार्गो जहाज MV AGN Ragnar पर ड्रोन हमले के बाद लापता भारतीय दीपक कुमार गुप्ता का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठा। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की कानूनी जिम्मेदारी पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने पूछा कि किसी दूसरे संप्रभु देश के क्षेत्र में हुए उसके दुश्मन देश के हमले की जांच में भारतीय कानून क्या करेगा ? उस मामले की जांच किस वैधानिक प्रावधान के आधार पर की जा सकती है। ऐसे में अब दिल्ली पुलिस को तो यूक्रेन जांच के लिए नहीं भेजा सकता...

विदेश में जांच का कानूनी आधार क्या है?

7 सितंबर की सुनवाई में मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। पीठ ने याचिका कर्ता के वकील से पूछा कि किसी संप्रभु विदेशी देश के बाहर हुए दुश्मनी हमले की जांच भारतीय कानून के तहत किस वैधानिक प्रावधान के आधार पर की जा सकती है। CJI सूर्यकांत ने भी पूछा कि ऐसी जांच या कार्रवाई के लिए भारत की अंतरराष्ट्रीय बाध्यता किस संधि से आती है। मामले में देखा जाए तो अदालत का सवाल मूल रूप से भारत के घरेलू कानून और दूसरे देश की संप्रभुता के बीच कानूनी सीमा से जुड़ा है।

क्या दिल्ली पुलिस को यूक्रेन भेजा जाए : CJI सूर्यकांत

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से सवाल किया कि क्या उनकी मांग का मतलब यह है कि दिल्ली पुलिस को रोमानिया और यूक्रेन भेजकर जांच कराई जाए। अदालत ने संकेत दिया कि विदेशी क्षेत्र में हुई घटना की प्रत्यक्ष जांच भारत की सामान्य आपराधिक जांच शक्तियों के तहत स्वतः नहीं की जा सकती। दूसरे देश के क्षेत्र में कार्रवाई के लिए उस देश की अनुमति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग या लागू अंतरराष्ट्रीय कानून का आधार महत्वपूर्ण हो सकता है।

ऐसी घटना जो यू्क्रेन और रूस जैसे संप्रभुता वाले देशों से जुड़ी है. भारत के कानूनों के तहत कितनी जांच संभव है? अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि संबंधित देशों ने औपचारिक रूप से युद्ध घोषित नहीं किया था और न यह भारत के विरुद्ध युद्ध है। ... यदि घोषित युद्ध की स्थिति होती तो Geneva Convention सहित युद्ध संबंधी अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रावधानों की प्रासंगिकता अलग तरीके से सामने आ सकती थी।

संप्रभु देश से जुड़े संदर्भ में जस्टिस बागची की टिप्पणी

सरकार विदेशी अधिकारियों के साथ संपर्क में

मामले में सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी पेश हुए थे। उन्होेंने याचिकाकर्ता के इस आरोप का विरोध किया कि भारतीय अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने अदालत को बताया कि भारतीय अधिकारी रोमानिया और यूक्रेन के संबंधित अधिकारियों के साथ मामले को आगे बढ़ा रहे हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने MEA को राजनयिक माध्यमों से दीपक कुमार गुप्ता का पता लगाने और यूक्रेन तथा रोमानिया स्थित भारतीय मिशनों से जानकारी लेने का निर्देश भी दिया था।

फिलहाल मामला अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की कानूनी जिम्मेदारी पर कोई अंतिम फैसला भी नहीं सुनाया है। केंद्र सरकार , यूक्रेनी अधिकारियों के साथ मिल कर लापता भारतीय को खोजने की कोशिश भी कर रही है।

दूसरी बात ...सुप्रीम कोर्ट ने मामले में संकेत दिया है कि परिवार को केवल सरकारी एजेंसियों की कथित कमियों पर बहस करने के बजाय उपलब्ध मुआवजा और बीमा दावे हासिल करने में भी सहायता मिलनी चाहिए। पिछली सुनवाई में भी अदालत ने केंद्र से लापता सीफेररों के परिवारों के इंश्योंरेंस दिलाने में सहायता करने को कहा था।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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