सच्चाई की तलाश में: सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल बाद दुष्कर्म के दोषी को रिहा किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे का मुख्य उद्देश्य सच्चाई की खोज है, न कि केवल अभियोजन‑आरोपी का प्रतिद्वंद्व। इस विचारधारा के आधार पर अदालत ने निचली अदालत और राजस्थान उच्च न्यायालय की साक्ष्य‑अवलोकन में लापरवाही को उजागर कर, पाँच वर्षीय बच्ची के दुष्कर्म में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को नौ साल के बाद रिहा कर दिया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
ट्रायल में सत्य की खोज होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल बाद दुष्कर्म के दोषी को रिहा किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत और राजस्थान उच्च न्यायालय ने व्यक्ति को दोषी ठहराने और सजा को बरकरार रखने में गंभीर भूल की.
By Sumit Saxena
Published : September 7, 2026 at 9:34 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस बात पर जोर दिया कि एक आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपी के बीच प्रतिद्वंद्वात्मक मुकाबला नहीं है, बल्कि यह सत्य की न्यायिक खोज है. इस बात पर जोर देते हुए कि जब महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की जा रही हो, तो अदालतें "मूक दर्शक" नहीं बनी रह सकतीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायसंगत निर्णय के लिए आवश्यक सामग्री को उचित रूप से रिकॉर्ड पर लाया जाए और दोषसिद्धि के निष्कर्ष सिर्फ कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्यों पर ही आधारित हों.
शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां पांच वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म के दोषी व्यक्ति को बरी करते हुए कीं. इस व्यक्ति ने 9 साल से अधिक समय हिरासत में बिताया था.
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि निचली अदालत और राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी व्यक्ति को दोषी ठहराने और उसकी सजा को बरकरार रखने में गंभीर भूल की है.
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता नमित सक्सेना ने किया. सक्सेना ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को स्थानीय विधायक के इशारे पर झूठा फंसाया गया था, जिसके साथ आरोपी-अपीलकर्ता की दुश्मनी थी. उन्होंने दलील दी कि पीड़िता ने पुलिस को दिए अपने शुरुआती बयानों में हमलावर के बारे में कोई जानकारी या पहचान के लक्षण नहीं बताए थे.
यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी-अपीलकर्ता उसी गांव का स्थायी निवासी था, पूरे समय उपलब्ध रहा और उसने गिरफ्तारी से बचने की कोशिश नहीं की; इसलिए, पहचान का कोई आधार न होने के बावजूद लगभग दो महीने बाद ही उसे पकड़े जाने का तथ्य, अभियोजन पक्ष के मामले पर गंभीर संदेह पैदा करता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए और उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट किए गए निष्कर्ष, जिनमें यह माना गया था कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय और भरोसेमंद साक्ष्यों पर आधारित है, तथ्यों और कानून की दृष्टि से प्रथम दृष्टया टिकने योग्य नहीं हैं. पीठ ने कहा, "ट्रायल कोर्ट द्वारा 5 सितंबर 2019 को पारित निर्णय और उच्च न्यायालय द्वारा 20 अगस्त 2025 को पारित आक्षेपित निर्णय जांच में खरे नहीं उतरते हैं और इन्हें रद्द किया जाता है.
पीठ ने कहा कि एक आपराधिक मुकदमा सिर्फ अभियोजन पक्ष और आरोपी के बीच एक प्रतिपक्षी मुकाबला नहीं है. अदालत का अंतिम दायित्व सच्चाई का पता लगाना और यह सुनिश्चित करना है कि दोषसिद्धि का निष्कर्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्य पर आधारित हो.
पीठ ने कहा कि कोर्ट से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह मूक दर्शक बना रहे, जब आरोपी के गुनाह या बेगुनाही से सीधे जुड़े साक्ष्यों पर ध्यान न दिया जाए.
पीठ ने कहा, "अदालत की भूमिका सिर्फ पक्षों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को सिर्फ रिकॉर्ड करने तक सीमित नहीं है; न्यायसंगत निर्णय के लिए जरूरी भौतिक साक्ष्यों को उचित रूप से रिकॉर्ड पर लाया जाना सुनिश्चित करना अदालत के लिए आवश्यक है."
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित सरकारी वकील (public prosecutor) की घोर लापरवाही और पीठासीन अधिकारी द्वारा दिखाई गई घोर अज्ञानता के कारण, पीड़िता के बयान दर्ज होने के दौरान आरोपी-अपीलकर्ता की पहचान कराने का कोई प्रयास नहीं किया गया, ताकि इस बात की पुष्टि की जा सके कि मुकदमे का सामना कर रहा व्यक्ति ही वास्तव में हमलावर था.
पीठ ने कहा कि इस प्रक्रिया को पूरा न करना बेहद गंभीर बात है, क्योंकि अभियोजन पक्ष ने आखिर में आरोपी-अपीलकर्ता को अपराध से जोड़ने के लिए TIP (टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड) के दौरान की गई पहचान पर भरोसा करने का प्रयास किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना के समय के बारे में मेडिकल सबूतों और गवाहों के बयानों में काफी अंतर है, जो मामले की जड़ तक जाता है और अभियोजन पक्ष के केस की सच्चाई पर असर डालता है.
पीठ ने कहा, "हम इस तथ्य पर भी गौर करते हैं कि आरोपी-अपीलकर्ता नौ साल से अधिक समय से हिरासत में है. मामले के अजीब तथ्यों और परिस्थितियों में, पीड़िता का बयान नए सिरे से दर्ज करने के लिए मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस भेजने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा."
पीठ ने कहा कि पहचान के पहलू पर बड़ी कमी को इस देर से ठीक नहीं किया जा सकता, भले ही हम केस को नए सिरे से ट्रायल के लिए भेजने पर विचार करें. पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता को आरोपों से बरी किया जाता है. वह हिरासत में है और अगर किसी और केस में उसकी हिरासत की जरूरत नहीं है, तो उसे तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाएगा."
यह घटना दिसंबर 2016 में हुई थी. आईपीसी की धारा 376 और POCSO एक्ट, 2012 की धारा 3/4 के तहत FIR दर्ज की गई थी. आरोपी-अपीलकर्ता को 5 फरवरी, 2017 को गिरफ्तार किया गया था.
यह भी पढ़ें- 16 साल और सात महीने जेल में बिताए... सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की दोषसिद्धि रद्द की
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