पॉडकास्ट के बयान से न्यायालय में अपराध सिद्ध? स्वातंत्र्य भारद्वाज केस की कानूनी जाँच
दिल्ली की अदालत ने स्वातंत्र्य भारद्वाज को जंतर-मंतर मारपीट मामले में एक दिन की पुलिस कस्टडी दी है, जबकि उनके पॉडकास्ट में किए गए अपराध के बयान को अभी तक अंतिम साक्ष्य नहीं माना जा सकता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत केवल स्वैच्छिक, दबाव‑मुक्त स्वीकारोक्तियों को मान्य माना जाता है; इसलिए पॉडकास्ट के वीडियो को इलेक्ट्रॉनिक सबूत के रूप में पेश किया जा सकता है, परन्तु उसे अकेले दोषसिद्धि के प्रमाण के रूप में नहीं माना जाएगा।

सौजन्य से:- Navbharat Times
स्वतंत्र भारद्वाज केस में अभी क्या हुआ है?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की अदालत ने स्वतंत्र भारद्वाज को कथित जंतर-मंतर मारपीट मामले में एक दिन की पुलिस कस्टडी दी है। शुरुआत में उनके खिलाफ BNS की धारा 115(2) और 126(2) के तहत मामला दर्ज था, लेकिन बाद में SC/ST Act और POCSO Act से जुड़े प्रावधान भी जोड़े गए। फिलहाल मामले की जांच जारी है और किसी आरोप का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है। इसलिए ऐसे में अभी पॉडकास्ट में भारद्वाज के द्वारा कही गई गई बड़े बोले पन वाली बात को अंतिम दोष सिद्धि मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।क्या पॉडकास्ट में कही बात 'कबूलनामा' हो सकती है?
- मामले में गौर करने वाली बात है कि कानून में स्वीकारोक्ति का मतलब सामान्य तौर पर ऐसा बयान है जिससे किसी व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने की बात स्वीकार या उसका संकेत मिलता है। लेकिन सवाल यही है कि इस मामले में पॉडकास्ट यानी सोशल मीडिया के वायरल वीडियो की कानूनी अहमियत क्या होगी?
- दरअसल, भारतीय साक्ष्य अधिनियम Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में अदालत में इकबालिया बयान और स्वीकारोक्ति के लिए अलग प्रावधान हैं; धारा 22 जबरदस्ती, धमकी, लालच या दबाव से प्राप्त स्वीकारोक्ति को आपराधिक कार्यवाही में अप्रासंगिक बनाती है।
- इस मामले में पॉडकास्ट में किए गए दावे अदालत के सामने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश किए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने आप 'अपराध की अंतिम स्वीकारोक्ति' मान लेना सही नहीं होगा।
- मतलब यह है कि किसी पॉडकास्ट में कथित रूप से अपराध स्वीकार करने से यह अपने-आप तय नहीं होता कि अदालत उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेगी। अदालत बयान का पूरा संदर्भ, उसकी प्रामाणिकता, स्वैच्छिकता और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से उसका मेल देख सकती है।
पॉडकास्ट में किया गया दावा पुलिस जांच का आधार बनेगा?
ऐसा इस मामले में हो सकता है, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। दरअसल कोई सोशल मीडिया बयान जांच का सुराग या सबूत हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अकेले दोष साबित करने के लिए पर्याप्त होगा। एक बात यह भी है कि 'मैंने किया' कहना और अपराध साबित होना दो अलग बातें हैं।भारद्वाज का आत्म रक्षा वाला वीडियो भी है खास
अदालत के सामने यदि भारद्वाज का वीडियो पहले वाला वायरल वीडियो पेश होगा तो उसके साथ अब एक और वायरल वीडियो सामने आया है जिसमें कथित तौर पर भारद्वाज का कहना है कि उसने हमला आत्मरक्षा में किया क्योंकि वह लोगों से घिर गया था। ऐसे में अभियोजन पक्ष केवल “उसने हमला करने की बात कही” पर नहीं रुक सकता; उसे घटना के बाकी साक्ष्यों .. बाद का वायरल वीडियो, मेडिकल रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी, मौके की परिस्थितियां और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड से यह स्थापित करना होगा कि कार्रवाई अपराध की कानूनी कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं।सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘आदेश में कारण जरूरी’, इलाहाबाद HC को दो टूक, फिर से खुलेगा मामला
अदालत के सामने चुनौती और कानूनी मानकों की कसौटी
- स्वतंत्र भारद्वाज का मामला मामला सोशल मीडिया युग में आपराधिक सबूतों के बदलते स्वरूप को समझने का अच्छा उदाहरण है।
- किसी पॉडकास्ट, इंटरव्यू या सोशल मीडिया पोस्ट में कथित अपराध को स्वीकार करना अदालत के लिए प्रासंगिक इलेक्ट्रॉनिक सबूत हो सकता है, लेकिन वह अपने आप दोषसिद्धि नहीं है।
- BSA, 2023 इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में मान्यता देता है, जबकि कबूलनामे के मामले में...स्वेच्छा से दिए गए बयान, परिस्थितियां और पुलिस के जरिए कबूलनामे पर विशेष सीमाएं लागू होती हैं।
- ऐसे में तय अदालत को ही करना है कि उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य मिलकर आरोपों को कानूनी मानक के अनुसार साबित करते हैं या नहीं।
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