सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णय: आर्टिकल 131 सीमित, बेदख़ली रोक, दहेज निर्देश एवं मोटर दुर्घटना बीमा फर्जी दावों की जाँच
सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 131 के अधिकार क्षेत्र को केवल भारत संघ और राज्यों के बीच विवाद तक सीमित कर दिया, बेदख़ली के लिए समरी प्रोसीडिंग्स पर रोक लगाई, दहेज मामलों में तेज सुनवाई और नियमित निगरानी के निर्देश दिए, और सभी राज्यों से मोटर दुर्घटना मुआवज़े के फर्जी दावों की जाँच के लिये विशेष स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीमें बनाने का आदेश जारी किया।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
Shahadat
30 Aug 2026 8:30 AM IST
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (24 अगस्त, 2026 से 28 अगस्त, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
कानूनी अथॉरिटी आर्टिकल 131 का इस्तेमाल नहीं कर सकती, यह केंद्र-राज्य विवादों तक सीमित: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई कानूनी अथॉरिटी या राज्य की संस्था संविधान के आर्टिकल 131 के तहत अपने ओरिजिनल अधिकार क्षेत्र (Original Jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि यह प्रावधान भारत संघ और एक या अधिक राज्यों के बीच विवादों तक ही सीमित है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए यह बात कही। हाईकोर्ट ने लखनऊ में ज़मीन के कब्ज़े से जुड़े विवाद पर लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी (LDA) की लंबे समय से लंबित रिट याचिका खारिज की थी।
Case : Lucknow Development Authority v. Union of India & Ors., Civil Appeal No. 11201 of 2026
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जब ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर असली विवाद हो तो सरकार तुरंत बेदख़ली की कार्रवाई नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर कोई असली विवाद हो तो सरकार बेदख़ली के लिए तुरंत कार्रवाई (समरी प्रोसीडिंग्स) नहीं कर सकती, खासकर तब जब विवाद कब्ज़े और मालिकाना हक़ से जुड़ा हो जो कई दशकों पुराना हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने आंध्र प्रदेश असाइन्ड लैंड (ट्रांसफर पर रोक) एक्ट, 1977 के संदर्भ में यह फ़ैसला सुनाया कि मालिकाना हक़ से जुड़े पुराने विवादों का फ़ैसला तुरंत कार्रवाई के ज़रिए नहीं किया जा सकता।
Cause Title: M/s Circar Paper Mills Ltd. v. District Collector, Nellore Distt. & Ors. (with connected matters)
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दहेज मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तेज सुनवाई और नियमित निगरानी के लिए राज्यों को दिए निर्देश
दहेज से जुड़े अपराधों के प्रभावी क्रियान्वयन और मामलों के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और हाईकोर्ट को कई अहम निर्देश जारी किए। कोर्ट ने दहेज निषेध अधिकारियों की व्यवस्था को प्रभावी बनाने, दहेज हत्या और वैवाहिक क्रूरता से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुनने और लंबे समय से लंबित मामलों की नियमित निगरानी करने को कहा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 20 अगस्त को ये निर्देश जारी किए।
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सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को मोटर दुर्घटना बीमा के फर्जी दावों की जांच के लिए SIT बनाने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे मोटर दुर्घटना मुआवज़े के संदिग्ध फर्जी दावों की जांच के लिए खास स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीमें (SIT) बनाएं। यह निर्देश एक ऐसे मामले की सुनवाई के बाद दिया गया, जिसमें आरोप है कि एक ही गाड़ी को कई दुर्घटनाओं में शामिल दिखाया गया था; कोर्ट ने इसे "बहुत बड़े पैमाने" पर संभावित धोखाधड़ी बताया।
कोर्ट ने बीमा कंपनियों को यह भी निर्देश दिया कि वे उन मामलों को SIT को सौंपें जिनमें दावों को खारिज कर दिया गया, ताकि यह पता लगाने के लिए इन-हाउस जांच की जा सके कि क्या दावा उनके अधिकारियों की मिलीभगत से प्रोसेस किया गया।
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Banke Bihari Temple | भक्तों का चढ़ावा सीधे दान पेटी या ऑनलाइन खजाने में जाना चाहिए, सेवायत दखल न दें: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आदेश दिया कि वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में दान किया गया हर पैसा मंदिर की दान पेटियों या ऑनलाइन खजाने में जमा किया जाना चाहिए। यह आदेश तब आया जब कोर्ट द्वारा नियुक्त हाई-पावर्ड मंदिर प्रबंधन समिति ने आरोप लगाया कि सेवायतों के भंडारी भक्तों से सीधे चढ़ावा इकट्ठा कर रहे थे।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने समिति को मंदिर के खजाने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया।
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एग्जीक्यूशन कोर्ट आदेश से आगे बढ़कर ऐसी राहत नहीं दे सकता, जो उसमें शामिल न हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि एग्जीक्यूशन कोर्ट (आदेश लागू करने वाली अदालत) के लिए उस आदेश या डिक्री से आगे बढ़कर ऐसी राहत देना सही नहीं है, जिसका आदेश में कोई ज़िक्र न हो या जिसका इरादा न हो।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, "एग्जीक्यूशन कोर्ट उस आदेश से आगे नहीं बढ़ सकता जिसे लागू किया जाना है, और न ही उसकी व्याख्या (Interpretation) में गहराई से जा सकता है, खासकर तब जब आदेश में किसी और या खास व्याख्या की ज़रूरत न हो।"
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