हाईकोर्ट ने कहा: किशोर न्याय का लक्ष्य सजा नहीं, बाल अपराधियों का पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापना है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम 2015 की व्याख्या करते हुए बताया कि इसका प्रमुख उद्देश्य दंड के बजाय बाल अपराधियों का पुनर्वास, विकास और सर्वोत्तम हित की रक्षा करना है। न्यायालय ने बताया कि किशोर न्याय बोर्ड व बाल न्यायालय को बच्चे के संरक्षक की भूमिका निभाते हुए उसकी देखभाल, शिक्षा और समाज में पुनर्स्थापना सुनिश्चित करनी चाहिए।

सौजन्य से:- ETV Bharat
हाईकोर्ट का फैसला: किशोर न्याय कानून का मकसद सजा देना नहीं, बाल अपचारियों का पुनर्वास और विकास है
किशोर न्याय कानून का मुख्य उद्देश्य बाल अपचारियों को केवल दंडित करना नहीं है, बल्कि उनका पुनर्वास, विकास और समाज में पुनर्स्थापना सुनिश्चित करना है.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : August 31, 2026 at 10:03 PM IST
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में किशोर न्याय कानून की व्याख्या करते हुए कहा है कि कानून का उद्देश्य बाल अपचारियों को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि उनके पुनर्वास, विकास और समाज में पुनर्स्थापना को सुनिश्चित करना है. न्यायालय ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 ने कठोर दंडात्मक व्यवस्था से हटकर पुनर्वासात्मक न्याय की अवधारणा को अपनाया है. किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालयों को अपने न्यायिक दायित्वों के साथ बच्चों के पुनर्वास और पुनर्स्थापना की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. कासगंज और जालौन के दो बाल अपचारियों की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अजय भनोट ने यह निर्णय दिया.
बाल अधिकारों के तहत सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता: राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और एजीए प्रथम परितोष कुमार मालवीय जबकि न्यायालय के सहयोग के लिए एमिकस क्यूरी अधिवक्ता विजेता सिंह और अपीलार्थी के वकीलों ने पक्ष रखा. कोर्ट ने कहा कि भारत ने 11 दिसंबर 1992 को संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार संबंधी कन्वेंशन को स्वीकार किया था. इसके बाद बच्चों के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए किशोर न्याय कानून में व्यापक प्रावधान किए गए. अधिनियम का उद्देश्य कानून से संघर्षरत बच्चों और देखभाल एवं संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों के हितों की रक्षा करना है.
दंडात्मक से पुनर्वासात्मक न्याय की ओर बदलाव: न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 3 के तहत बच्चे के सर्वोत्तम हित, सकारात्मक उपाय, संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प और न्यायिक प्रक्रिया से अलग वैकल्पिक उपाय जैसे सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बताया. कोर्ट ने कहा कि हर निर्णय में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और उसकी क्षमताओं के पूर्ण विकास के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय व्यवस्था का स्वरूप दंडात्मक से पुनर्वासात्मक न्याय की ओर बदला है. न्यायालय के अनुसार कानून का मकसद बच्चों को दंड देकर समाज से अलग करना नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाकर मुख्यधारा में वापस लाना है.
संरक्षक के रूप में जिम्मेदारी निभाएंगी अदालतें: किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालय बच्चे के संरक्षक की भूमिका में भी कार्य करते हैं. इस व्यवस्था में अदालतें पैरेन्स पैट्रिए अर्थात बच्चे के संरक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे और उसके माता-पिता अथवा अभिभावक की प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में सूचित भागीदारी हो. बच्चे के अधिकारों की गिरफ्तारी से लेकर जांच, देखभाल और पुनर्वास तक लगातार रक्षा की जानी चाहिए. यदि कानून से संघर्षरत बच्चा देखभाल और संरक्षण का भी जरूरतमंद है तो मामले को बाल कल्याण समिति के समक्ष भेजने की व्यवस्था है.
बाधित शिक्षा को दोबारा शुरू कराने की जिम्मेदारी: कोर्ट ने किशोर न्याय नियमावली के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर बोर्ड को बच्चे की प्रगति पर निगरानी रखने के लिए पुनर्वास कार्ड जारी करना चाहिए. यदि किसी बच्चे की शिक्षा जांच लंबित होने या बाल देखभाल संस्था में रहने के कारण बाधित हुई है तो उसकी दोबारा स्कूल में वापसी या शिक्षा जारी रखने के लिए उचित आदेश पारित किए जा सकते हैं. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे को रिहा किए जाने के बाद भी पुनर्वास और समाज में पुनर्स्थापना की प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती. किशोर न्याय बोर्ड को उसकी निगरानी और देखभाल जारी रखनी होगी.
बाल हितैषी वातावरण में हो न्यायिक प्रक्रिया: बच्चे को उपयुक्त व्यक्ति, संस्था अथवा परिवीक्षा अधिकारी की देखरेख में सौंपते समय उसकी उचित देखभाल, शिक्षा और कल्याण सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है. न्यायालय ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 14 का उल्लेख करते हुए कहा कि बोर्ड की कार्यवाही यथासंभव सरल होनी चाहिए और बच्चे को पूरी प्रक्रिया के दौरान बाल हितैषी वातावरण मिलना चाहिए. न्यायिक प्रक्रिया ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे बच्चा भय, दबाव या सामाजिक बहिष्कार का सामना करे. कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी बच्चे के संबंध में अंतिम आदेश पारित करने से पहले सामाजिक जांच रिपोर्ट प्राप्त करना आवश्यक है.
पुनर्वास और बेहतर भविष्य पर टिका कानून का ढांचा: प्रत्येक निपटारा आदेश में बच्चे के लिए व्यक्तिगत देखभाल योजना शामिल होनी चाहिए, ताकि उसके पुनर्वास, शिक्षा, विकास और समाज में पुनर्स्थापना के लिए ठोस योजना बनाई जा सके. हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का पूरा ढांचा इस सोच पर आधारित है कि कानून से संघर्षरत बच्चा केवल अपराध का आरोपी नहीं है, बल्कि उसके विकास, शिक्षा, पहचान और भविष्य की भी चिंता की जानी चाहिए. इसलिए किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालयों को केवल मामले का फैसला करने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि बच्चे के पुनर्वास और बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करने वाली संस्था के रूप में अपनी भूमिका निभानी होगी.
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