सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों पर हमले वाले शिवसेना पार्षद की जमानत पर कड़ी टिप्पणी, सम्मान की अपील की
कैल्याण-डोंबिवली के शास्त्रीनगर अस्पताल में 6 जुलाई 2026 को डॉक्टरों पर हुई मारपीट के बाद, शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को पहले जमानत मिली थी लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे रोका। इस पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे आरोपियों को जमानत नहीं दी जानी चाहिए और मेडिकल समुदाय के प्रति सम्मान आवश्यक है, जबकि अंतिम फैसला अभी शेष है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
डॉक्टरों पर हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए, मेडिकल समुदाय के प्रति सम्मान जरूरी है...शीर्ष अदालत ने शिवसेना पार्षद रमेश सुख्या म्हात्रे की जमानत पर कड़ी टिप्पणी की है।
नई दिल्ली: आपको याद होगा...6 जुलाई 2026 को हुई घटना, जिसमें कल्याण डोंबिवली नगर निगम के शास्त्रीनगर अस्पताल में शिवसेना पार्षद और अन्य साथ के लोगों ने एक अस्पताल में चिकित्सकों के साथ झड़प की थी। मामले में गिरफ्तार किए गए शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट से जमानत मिली, फिर बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस जमानत पर रोक लगाई। अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान डॉक्टरों पर अस्पताल के अंदर होने वाली हिंसा को गंभीरता से लेते हुए तीखी टिप्पणी की है।
विवाद की पृष्ठभूमि और डॉक्टरों से मारपीट का पूरा मामला?
मामला 6 जुलाई 2026 को कल्याण-डोंबिवली नगर निगम के शास्त्रीनगर अस्पताल में हुई कथित मारपीट से जुड़ा है। जो अदालती रिकॉर्ड है उसके अनुसार, मामले में तीन ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों के साथ शिवसेना पार्षद के कथित मारपीट का आरोप है। हालांकि याचिका में पार्षद म्हात्रे का पक्ष यह है कि वह एक नौ महीने की गर्भवती महिला को कई घंटे इंतजार करना पड़ा और इसके बाद अस्पताल कर्मचारियों के साथ विवाद हुआ। घटना से जुड़े CCTV और वीडियो रिकॉर्डिंग को जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
पार्षद को पहले मिली जमानत, फिर हुई रद्द
शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे को 9 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था। कल्याण मजिस्ट्रेट ने 14 जुलाई को उन्हें जमानत दी। लेकिन इसके बाद मामले ने अलग कानूनी मोड़ लिया। डॉक्टरों के विरोध और घटना की गंभीरता के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने खुद से संज्ञान लेकर मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगा दी। अदालत ने विशेष रूप से उनके कथित आपराधिक पिछले जीवन और घटना की गंभीरता को भी ध्यान में रखा।
अपने समर्थकों के साथ आप अस्पताल के अंदर जाकर किसी भी व्यक्ति को मारना शुरु कर देंगे? जब कोई भीड़ किसी पर हमला करती है तो उस व्यक्ति के मानसिक आघात या भय की कल्पना कीजिए। यह गलत है।
शीर्ष अदालत की शिव सेना पार्षद मामले में कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 18 जुलाई और 7 अगस्त के आदेशों को चुनौती दी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मुख्य रूप से हाई कोर्ट द्वारा लगाई गई कड़ी शर्तों पर आपत्ति जताई।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ मंगलवार को म्हात्रे की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ी बात कही कि मेडिकल समुदाय के प्रति सम्मान होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने डॉक्टरों पर अस्पताल के भीतर हमले को गंभीरता से लिया। पीठ ने कहा कि ऐसे लोगों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए और पूछा कि अस्पताल में जाकर किसी व्यक्ति पर हमला कैसे किया जा सकता है।
फिर आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह राज्य सरकार की ओर से दायर होने वाली जमानत रद्द करने की याचिका का इंतजार करेगा।मामले को अगले सप्ताह की शुरुआत में सुनवाई के लिए सोमवार को सूचीबद्ध किया गया।
मामले में खास गौर करने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को जमानत रद्द करने का अंतिम आदेश नहीं समझना चाहिए। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह बॉम्बे हाई कोर्ट के उस शुरुआती आदेश को बरकरार रखने की ओर है, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगाई गई थी। साथ ही अदालत ने कहा कि वह राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित जमानत रद्द करने की याचिका का इंतजार करेगी। अंतिम फैसला अभी बाकी है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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