सुप्रीम कोर्ट में फेस रिकग्निशन पर बड़ा फैसला: जंतर-मंतर प्रदर्शन में फेस रिकग्निशन का किया गया इस्तेमाल
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (एफआरटी) का इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है.

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पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (एफआरटी) के इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है.
मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को जंतर-मंतर प्रदर्शन से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ने का निर्देश दिया है.
याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल नागरिकों की निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है.
याचिकाकर्ताओं का तर्क शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफ. आर. एस. का इस्तेमाल निजता के अधिकार और लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के अधिकार का उल्लंघन है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बिना किसी स्पष्ट कानून के प्रदर्शनकारियों की निगरानी करना नागरिकों की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा का सीधा उल्लंघन है.
ये भी पढ़ें: CJP प्रोटेस्ट में फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल सही? जानें क्या कहता है कानून
दरअसल, भारत में कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है. 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम, ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना शुरू किया. हालांकि, इन तकनीकों के उपयोग को विनियमित करने के लिए अब तक कोई स्पष्ट और व्यापक कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया गया है. ऐसे में निजता के अधिकार, जवाबदेही और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को लेकर लगातार बहस जारी है.
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यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब स्वतंत्रता दिवस से पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को हाई अलर्ट पर रखा गया है. सुरक्षा एजेंसियों ने राजधानी के कई संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है. लाल किले के आसपास करीब 1,000 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से लैस कैमरे भी शामिल हैं.
दिल्ली पुलिस भीड़भाड़ वाले इलाकों में संदिग्ध और वांछित लोगों की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक का व्यापक इस्तेमाल कर रही है. इसके लिए 'अभिज्ञान' नामक एप्लीकेशन का भी उपयोग किया जा रहा है, जिसमें एक करोड़ से अधिक अपराधियों का डेटा मौजूद है. पुलिसकर्मी हैंडहेल्ड डिवाइस के जरिए फिंगरप्रिंट की जांच कर रहे हैं, जबकि फेशियल रिकग्निशन वैन भी रणनीतिक स्थानों पर तैनात की गई हैं.
फेशियल रिकग्निशन तकनीक सीसीटीवी से कैसे अलग है?
फेशियल रिकग्निशन तकनीक पारंपरिक सीसीटीवी कैमरों से काफी अलग है. सामान्य सीसीटीवी कैमरे केवल तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड करते हैं, जबकि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किसी व्यक्ति के चेहरे का विश्लेषण करके उसका एक बायोमेट्रिक प्रोफाइल तैयार करता है और फिर उसे पहले से मौजूद डेटाबेस से मिलाकर उसकी पहचान करने की कोशिश करता है.
यह भी पढ़ें: 40 घंटे में 80 लाख की लूट का खुलासा, इजराइली फेशियल रिकग्निशन तकनीक की मदद से पकड़े गए आरोपी
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सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर (एस. एफ. एल. सी.) के लीगल डायरेक्टर प्रशांत सुगथन का कहना है कि सक्रिय फेशियल रिकग्निशन तकनीक सामान्य वीडियो निगरानी से पूरी तरह अलग है. उनके मुताबिक, जब किसी व्यक्ति के चेहरे से जुड़े डेटा को डेटाबेस के साथ जोड़ा जाता है, तो यह सीधे तौर पर निजता के अधिकार से जुड़ा मामला बन जाता है. उनका मानना है कि इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल से व्यक्तिगत गोपनीयता के उल्लंघन की आशंका बढ़ जाती है.
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