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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई, सतेंद्र अंतिल फैसले को नज़रअंदाज़ करने का आरोप

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने के लिए पुलिस तंत्र की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि पुलिस अधिकारियों का कानून को पढ़ना-सammen नहीं है, और वे पूरी तरह से अपनी मनमर्जी से काम करते हैं।

3 जुलाई 2026 को 04:25 pm बजे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई, सतेंद्र अंतिल फैसले को नज़रअंदाज़ करने का आरोप

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट कुछ भी कहे, पुलिस अपनी मनमर्जी करती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'सतेंद्र अंतिल' फैसले को नज़रअंदाज़ करने पर पुलिसकर्मी को फटकार लगाई

Shahadat

3 July 2026 8:57 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ) ने गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का खुलेआम उल्लंघन करने के लिए पुलिस तंत्र की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि पुलिस अधिकारियों का कानून को "पढ़ने और समझने" से कोई लेना-देना नहीं है और वे पूरी तरह से अपनी मनमर्जी से काम करते हैं।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने नाबालिग को अवैध रूप से हिरासत में रखने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान ये मौखिक टिप्पणियां कीं। उस नाबालिग को चोरी के आरोप में जेल भेज दिया गया।

इससे पहले, 4 जून को कोर्ट ने नाबालिग को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था और उसकी हिरासत को प्रथम दृष्टया 'अवैध' करार दिया था।

ऐसा करते हुए बेंच ने गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मियों को तलब किया और संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा। उनसे यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि उन्होंने नाबालिग की उम्र की पुष्टि किए बिना और "पूरी तरह से यांत्रिक" तरीके से न्यायिक हिरासत को कैसे मंजूरी दी।

सुनवाई के दौरान, डिवीजन बेंच ने इस बात पर हैरानी जताई कि पुलिसकर्मियों और मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों और सतेंद्र अंतिल मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया था।

बता दें, कोर्ट ने पहले गौर किया था कि FIR दर्ज होने के समय 17 साल से कम उम्र के नाबालिग की उम्र को नज़रअंदाज़ करने के अलावा, मजिस्ट्रेट ने इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ किया कि जिन अपराधों [धारा 303 (3) BNS और 317 BNSS] का आरोप था, उनमें क्रमशः अधिकतम 3 और 5 साल की सज़ा का प्रावधान है।

उल्लेखनीय है कि सात साल तक की जेल की सज़ा वाले अपराध के आरोपी व्यक्तियों को पुलिस द्वारा धारा 35(3) BNSS के तहत नोटिस देना अनिवार्य है।

शुक्रवार को, जब राज्य के वकील ने 2 मई, 2026 को नाबालिग को गिरफ्तार करने के जांच अधिकारी (IO) के फैसले का बचाव करने की कोशिश की—यह दावा करते हुए कि आरोपी 'फरार' था और "जांच में सहयोग नहीं कर रहा था"—तो बेंच ने तुरंत हस्तक्षेप किया।

कोर्ट ने सवाल किया कि IO गिरफ्तारी के ही दिन "सहयोग न करने" का निष्कर्ष कैसे निकाल सकता है, जबकि आरोपी को जांच में शामिल होने के लिए कोई पूर्व नोटिस भी जारी नहीं किया गया।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की लगातार अनदेखी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बेंच ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी की:

"सुप्रीम कोर्ट चाहे कुछ भी करे, इसे एक लाइन में समझ लें: अर्नेश कुमार से लेकर सतेंद्र अंतिल तक के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के 4-5 फैसले आने और सुरक्षा के बारे में इतनी बातें कहे जाने के बावजूद, पुलिस अधिकारियों को पढ़ने-लिखने या समझने से कोई लेना-देना नहीं है। वे वही करेंगे जो उन्हें ठीक लगेगा। उन्हें कानूनों और नियमों की क्या परवाह? वे कानूनों और नियमों के लिए बने ही नहीं हैं!"

बेंच ने संबंधित IO (जांच अधिकारी) को, जो अदालत में मौजूद थे, चेतावनी दी कि सतेंद्र अंतिल (2022) फैसले के अनुसार, इस गंभीर चूक के लिए उन्हें विभागीय जांच और सजा का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, बेंच ने उस ACJM द्वारा दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे पर भी कड़ा संज्ञान लिया, जिन्होंने शुरू में रिमांड की अनुमति दी थी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील स्कंद बाजपेयी ने ACJM के हलफनामे का हवाला देते हुए बताया कि न्यायिक अधिकारी ने आरोपी (जो एक नाबालिग था) को न्यायिक हिरासत में भेजने को इस आधार पर सही ठहराया था कि "हिरासत में पूछताछ की वास्तव में आवश्यकता थी"।

यह तर्क दिया गया कि इससे पता चलता है कि न्यायिक विवेक का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया, जिससे अधिकारी "न्यायिक बिरादरी का सदस्य बने रहने के अयोग्य" हो गए।

यह भी बताया गया कि राज्य के अधिकारियों को इस याचिका की पहले से जानकारी थी, जिसमें स्कूल का ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) भी शामिल था, जिससे पता चलता था कि याचिकाकर्ता नाबालिग है। इसके बावजूद, पुलिस ने जानबूझकर TC और उसके नाबालिग होने की अहम बात को मजिस्ट्रेट से छिपाकर उसकी रिमांड मांगी।

इस बिंदु पर अदालत ने गौर किया कि मजिस्ट्रेट अक्सर पुलिस द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर "संसाधन-निर्भर" हो जाते हैं और इस तरह स्वतंत्र न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं।

हालांकि, हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर मजिस्ट्रेट ने बस उम्र की पुष्टि की होती या केस डायरी को ध्यान से देखा होता तो नाबालिग को कभी भी न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा जाता।

सुनवाई समाप्त करते हुए हाईकोर्ट ने विस्तृत जवाब मांगे और मामले को आगे की सुनवाई के लिए 16 जुलाई, 2026 को सूचीबद्ध किया।

बेंच ने स्पष्ट किया कि चूंकि दाखिल हलफनामों में सच्ची और बिना शर्त माफी नहीं मांगी गई, बल्कि इसके बजाय गैर-कानूनी कार्यों को हठपूर्वक सही ठहराने की कोशिश की गई, इसलिए अदालत उचित और सख्त आदेश पारित करेगी।

राज्य की ओर से वकील वी.के. सिंह पेश हुए।

हाईकोर्ट/ACJM की ओर से वकील शिशिर जैन पेश हुए।

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