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सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने से क्यों इनकार किया, समझिए

मेघालय हाईकोर्ट ने चर्चित राजा रघुवंशी हत्या मामले में सोनम रघुवंशी को जमानत दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कानूनी त्रुटियां हैं। सोनम पहले ही जमानत पर रिहा हो चुकी है और अदालत ने कहा कि उसकी हिरासत में भेजना उचित नहीं है।

3 जुलाई 2026 को 01:24 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने से क्यों इनकार किया, समझिए

सौजन्य से:- Navbharat Times

Raja Raghuvanshi Murder Case: सुप्रीम कोर्ट ने राजा रघुवंशी हत्या मामले में सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द करने से फिलहाल इनकार कर दिया है । आम आदमी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यूं हुआ...सुप्रीम कोर्ट का क्या अवलोकन रहा ...

नई दिल्ली: मेघालय में हनीमून मर्डर केस में चर्चित राजा रघुवंशी की हत्यारोपी को जब मेघालय हाईकोर्ट से जमानत मिली तो, लोगों को आश्चर्य हुआ कि ऐसे.. कैसे? लेकिन फिर जब इसके विरोध की याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगी तो समझा गया कि वहां जमानत रद्द हो जानी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी मामले में सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द करने से फिलहाल इनकार कर दिया। आम आदमी को समझ नहीं आया कि ऐसा क्यूं हुआ...इस स्टोरी में इसी की पड़ताल की गई है कि ऐसा कैसे हुआ...सुप्रीम कोर्ट का क्या अवलोकन रहा ...

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत गंभीर अपराध की प्रकृति को देखते हुए उचित नहीं थी। सरकार का कहना था कि यह मामला सुनियोजित हत्या का है और आरोपी को तकनीकी आधार पर राहत नहीं मिलनी चाहिए। राज्य ने यह भी दावा किया कि हाईकोर्ट के आदेश में कानूनी त्रुटियां हैं। इसी आधार पर जमानत निरस्त करने की मांग की गई।

दरअसल एक एक मामूली गलती की वजह से सोनम को 27 अप्रैल को ज़मानत मिली। इस मामले में FIR भारतीय न्याय संहिता BNSकी धारा 103 के तहत दर्ज की गई थी, जो कि हत्या से जुड़ी है। लेकिन, जब सोनम को उसकी गिरफ़्तारी की वजह बताई गई, तो पुलिस ने BNS की किसी और धारा की जिक्र किया था। ट्रायल कोर्ट ने पाया कि यह गलती सिर्फ़ एक दस्तावेज़ तक सीमित नहीं थी। गिरफ़्तारी मेमो, गिरफ़्तारी को सही ठहराने वाली चेकलिस्ट, इंस्पेक्शन मेमो, अधिकारों की जानकारी और केस डायरी के अंश समेत कई रिकॉर्ड में गलत धारा का ज़िक्र किया गया था। ऐसे सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई और कहा कि कई दस्तावेज़ों में ऐसी गलती को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करने से क्यों किया इनकार?

न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के ज़मानत देने वाले आदेश पर शुरु में अपनी आपत्ति जताई।

फिर इस बात पर भी गौर किया सोनम रघुवंशी पहले ही जमानत पर रिहा हो चुकी हैं। अदालत ने माना कि यदि किसी आरोपी को वैध न्यायिक आदेश के आधार पर रिहा किया जा चुका है तो अंतरिम स्तर पर उसे फिर से हिरासत में भेजना उचित नहीं होगा।

केवल इसलिए किसी आरोपी को दोबारा जेल नहीं भेजा जा सकता क्योंकि राज्य सरकार जमानत आदेश से असहमत है। न्यायालय ने यह भी कहा कि मामले की कानूनी समीक्षा जारी रहेगी।

कोर्ट ने मेघालय सरकार की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए विस्तृत सुनवाई का निर्णय लिया। साथ ही हाईकोर्ट के आदेश के कानूनी आधार पर प्रथमदृष्टया कुछ प्रश्न भी उठाए।

आखिर में अदालत ने साफ किया कि अंतरिम राहत और अंतिम निर्णय दोनों अलग-अलग कानूनी चरण हैं। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मेघालय हाईकोर्ट के आदेश के कुछ पहलुओं पर उसे प्रथमदृष्टया गंभीर आपत्तियां हैं। ऐसे में अब आगे की सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी।

मामले में आपने यह आधार बाद में उठाया। क्या गलत प्रावधान का ज़िक्र होने जैसी तकनीकी वजह पर ज़मानत देना सही है, खासकर तब जब पहले मामले के गुण-दोष के आधार पर ज़मानत खारिज कर दी गई थी?

राहत की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अब अदालत यह तय करेगी कि मेघालय हाईकोर्ट का जमानत आदेश कानूनी कसौटी पर कितना टिकता है। यदि हाईकोर्ट का निर्णय उचित पाया गया तो जमानत बरकरार रह सकती है। यदि सर्वोच्च अदालत को आदेश में गंभीर त्रुटि मिलती है तो वह भविष्य में जमानत रद्द भी कर सकती है। ऐसे में सोनम को मिली यह राहत चंद दिनों की ही हो सकती है। संभव हैै उसे फिर से हवालात जाना पड़ जाए। लेकिन एक बात साफ है कि इसमें अंतिम फैसला जो भी आए, भविष्य में गंभीर आपराधिक मामलों में जमानत से जुड़े कानूनी मानकों को भी प्रभावित कर सकता है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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