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हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर में असमान मानदंडों पर फिर उठे प्रश्न

संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत जजों का ट्रांसफर सीजीपी द्वारा वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट जजों और संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से सलाह लेकर किया जाता है, परंतु हालिया मामलों में स्पष्ट मानदंड की कमी उजागर हुई है। टि. विनोद कुमार को रिटायरमेंट के निकट मूल हाईकोर्ट वापस भेजने की सिफ़ारिश, डी. नागार्जुन का मूल कोर्ट न लौट पाने का निर्णय और डी.वी. रमना की पारिवारिक कारणों से ट्रांसफर की माँग को नज़रअंदाज़ किया जाना इस असमानता के उदाहरण हैं। इन घटनाओं ने पारदर्शी और समान नीति की आवश्यकता पर बल दिया है।

2 अक्टूबर 2026 को 07:04 am बजे
हाईकोर्ट जजों के ट्रांसफर में असमान मानदंडों पर फिर उठे प्रश्न

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com

एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर का विधान

हाईकोर्ट के जजों का एक हाईकोर्ट से दूसरे हाईकोर्ट ट्रांसफर संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत होता है। मौजूदा प्रक्रिया में ट्रांसफर का प्रस्ताव चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया चार वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट जजों से परामर्श के बाद शुरू करते हैं और संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों सहित अन्य संबंधित न्यायाधीशों की राय भी ली जाती है। लेकिन अब सवाल यह है कि जब किसी जज का ट्रांसफर पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी कठिनाई के कारण चुनौती में आता है, तो ऐसे मामलों में कॉलेजियम के सामने कोई स्पष्ट और समान मानदंड है या नहीं।जस्टिस टी. विनोद कुमार को रिटायरमेंट से पहले वापस भेजने की सिफारिश

- TOI की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 28 सितंबर 2026 की बैठक में मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस टी. विनोद कुमार को उनके मूल हाईकोर्ट, यानी तेलंगाना हाईकोर्ट, वापस भेजने की सिफारिश की। आधिकारिक प्रस्ताव में साफ कहा गया कि यह सिफारिश उनकी 16 नवंबर 2026 को होने वाली सेवानिवृत्ति को देखते हुए की गई है।

- जस्टिस टी. विनोद कुमार को 2025 में तेलंगाना हाईकोर्ट से मद्रास हाईकोर्ट ट्रांसफर किया गया था। TOI के अनुसार, अब रिटायरमेंट नजदीक होने के कारण उन्हें मूल हाईकोर्ट वापस भेजने की सिफारिश की गई है

- यहां कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉलेजियम के 28 सितंबर की आधिकारिक प्रस्ताव में स्थानांतरण कारण इसके बाद होने वाली रिटायरमेंट बताया गया है।

जस्टिस डी. नागार्जुन का मामला भी नजर में

यहां जस्टिस डी. नागार्जुन के मामले को भी इसी संदर्भ में उठाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना हाई कोर्ट से मद्रास हाई कोर्ट ट्रांसफर किए गए जस्टिस नागार्जुन ने जुलाई 2024 में रिटायरमेंट से पहले अपने मूल हाई कोर्ट लौटने का अनुरोध किया था, लेकिन उन्हें वापस तेलंगाना नहीं भेजा गया और उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में ही रिटायरमेंट लिया।जस्टिस डी.वी. रमना की बात, की गई नजरअंदाज

रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ट्रांसफर किए गए जस्टिस डी.वी. रमना का भी उल्लेख है। उन्होंने अपनी तंत्रिका तंत्र के रोगों से जूझ रही बीमार पत्नी के बेहतर इलाज के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में ट्रांसफर का विकल्प मांगा था, लेकिन उनकी मांग पर कार्रवाई नहीं हुई।मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के कानूनी फैसले पर उठे सवाल, जस्टिस शर्मा के बेटे के EC कनेक्शन की चर्चा

पारदर्शी ट्रांसफर नीति की मांग और निदान

- दरअसल, कई हाई कोर्ट जजों ने ट्रांसफर की प्रक्रिया में स्पष्ट प्रक्रिया या नियम नहीं होने पर असंतोष जताया है। रिपोर्ट में एक कॉलेजियम सदस्य के हवाले से पारदर्शी स्थानांतरण नीति बनाने की जरूरत का उल्लेख किया गया है।

- कानूनी तौर पर यहां इसके पहलुओं को भी समझना जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 222 के तहत संवैधानिक शक्ति और उस शक्ति के इस्तेमाल के लिए कॉलेजियम की प्रशासनिक प्रक्रिया।

- ऐसे में किसी सामान्य, प्रकाशित नीति का अभाव अपने आप किसी व्यक्तिगत ट्रांसफर को अवैध नहीं बनाता; लेकिन पारदर्शिता और समान मानदंड का सवाल प्रशासनिक एवं संस्थागत बहस का विषय बना हुआ है। जिसका हल व्यवस्था को ही निकालना होगा।

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