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सुप्रीम कोर्ट में 'वंदे मातरम्' पर तीखी बहस, गायक टीएम कृष्णा ने संवैधानिक अधिकारों की चुनौती

कर्नाटक के गायक टीएम कृष्णा ने संशोधित Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 के तहत 'वंदे मातरम्' के पूरे छह अंतरों के अनिवार्य गायन को चुनौती देते हुए अभिव्यक्ति, धार्मिक और अंतरात्मा की स्वतंत्रता पर असर का तर्क दिया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय गीत का निर्धारण सरकार की जिम्मेदारी है, पर धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर न गाने वाले व्यक्ति के अधिकारों की जांच करेगी, और केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

22 सितंबर 2026 को 02:06 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट में 'वंदे मातरम्' पर तीखी बहस, गायक टीएम कृष्णा ने संवैधानिक अधिकारों की चुनौती

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com

सिंगर टीएम कृष्णा को 'वंदे मातरम्' कानूनों से दिक्कत, याचिका में क्या

- कर्नाटक संगीत गायक टीएम कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट में 2026 में संशोधित Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 को चुनौती दी है। जिसके तहत अब राष्ट्रगान 'जन गण मन' के साथ साथ राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को भी समान कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है।

- याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें निर्धारित सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पूरे छह अंतरों के गायन की बात कही गई है।

- याचिकाकर्ता का तर्क है कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(a), 21 और 25(1) से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस और ‘न गाने’ के सवाल पर क्या कहा?

- गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की।

- मामले में जोरदार बहस के दौरान पीठ की मौखिक टिप्पणी रही कि अदालत को यह तय नहीं करना है कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए, उसके लिए सरकार है। लेकिन वह इस सवाल की जांच करेगी कि धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर वंदे मातरम् न गाने वाले व्यक्ति के अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है या नहीं।

- जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लेख कर 1986 के

फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति को दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।

- अदालत ने संकेत दिया कि यदि कोई व्यक्ति वास्तविक अंतरात्मा या धार्मिक आपत्ति के कारण राष्ट्रगीत के एक या सभी अंतरे नहीं गाता, तो केवल इस आधार पर आपराधिक अभियोजन का सवाल अलग तरीके से देखा जाना होगा।

- हालांकि, मंगलवार की सुनवाई में अदालत ने अंतिम फैसला नहीं दिया और केंद्र सरकार से इस संवैधानिक चुनौती पर जवाब मांगा है।

मामले में Bijoe Emmanuel केस का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

दरअसल, Bijoe Emmanuel v. State of Kerala मामले में तीन स्कूली बच्चों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। मामला जब सुप्रीम कोर्ट में आया तो अदालत ने सुनवाई के बाद 1986 में उनके पक्ष में फैसला देते हुए अंतरात्मा की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों पर विचार किया था। इस फैसले में अदालत ने यह भी माना था कि राष्ट्रगान का सम्मान करना और उसे अनिवार्य रूप से गाना, दोनों को हर परिस्थिति में एक ही नहीं माना जा सकता। इसीलिए जस्टिस जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई में इस अहम फैसले का जिक्र किया।मुसलमान UCC का विरोध क्यों करते हैं? मुस्लिम Personal Law और समान नागरिक संहिता की कानूनी बहस समझिए

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