सुप्रीम कोर्ट बेंच में 'नक्सलाइट' टिप्पणी को लेकर तीखी बहस, वंदे मातरम पर संवैधानिक चर्चा जारी
वंदे मातरम के संशोधन को चुनौती देती टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 'नक्सलियों की सोच के हिसाब से कानून नहीं बनता' कहा, जिस पर अधिवक्ता एस मुरलीधर ने तीखा विरोध किया और शब्द वापसी की माँग की। न्यायाधीशों ने चर्चा को संवैधानिक मुद्दों तक सीमित रखने की चेतावनी दी और केंद्र को काउंटर‑एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार को जब सीजेआई सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच में वंदे मातरम मामले पर सुनवाई चल रही थी, तब भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 'नक्सलाइट' को लेकर टिप्पणी कर दी, जिसपर एस मुरलीधर ने घोर आपत्ति की। मुरलीधर वंदे मातरम को लेकर मोदी सरकार की ओर से लिए गए हालिया फैसले और संशोधनों को चुनौती देने वाले टीएम कृष्णा की याचिका की पैरवी कर रहे थे।
वंदे मातरम से जुड़े सरकार के फैसलों पर जताई आपत्ति
बेंच के सामने मुरलीधर ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने बिना राष्ट्रीय सहमति बनाए, बिना पर्याप्त रूप से सोचे-विचारे वंदे मातरम पर संसद से संशोधन जल्दबाजी में पारित करा लिया। उनका दावा था कि संशोधन में इतना भी परिभाषित नहीं किया गया कि 'राष्ट्रगीत' है क्या। उन्होंने दलील दी, 'आदर्श रूप में इन चीजों के लिए जनमत तैयार किया जाना चाहिए।' उनके मुताबिक कानून बनाने की प्रक्रिया 'ऊपर से नीचे की ओर' चलना सही नहीं है।सॉलिसिटर जनरल की नक्सलियों की सोच वाली टिप्पणी पर विवाद
इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उन्हें टोकते हुए कहा, 'कानून संविधान के हिसाब से बनता है। नक्सलियों की सोच के हिसाब से कानून नहीं बनाया जा सकता।' मेहता की इसी टिप्पणी पर मुरलीधर ने घोर आपत्ति जताई और कहा, 'सॉलिसिटर ने अभी जिस उक्ति का इस्तेमाल किया है, उसे वापस लें। यह लाइव जा रहा है। मैं नहीं चाहता है कि सॉलिसिटर की यह उक्ति लाइव जाए। मैं इसपर कड़ी आपत्ति करता हूं। सॉलिसिटर वह शब्द दोहराएं, जो उन्होंने याचिकाकर्ता के लिए इस्तेमाल किए हैं।'नक्सलाइट वाली टिप्पणी वापस लेने पर हुई बहस
इसपर सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 'मैं नहीं चाहता कि कोई सवाल उठाए...उन्होंने कहा कि उन्हें डिसिजन-मेकिंग पर आपत्ति है। यह संविधान के अनुसार है।' जवाब में मुरलीधर ने कहा, 'ये टाल रहे हैं। मिस्टर सॉलिसिटर, प्लीज अपनी उक्ति वापस लें।''आप संविधान को चुनौती नहीं दे सकते'
इसपर जस्टिस बागची ने बीच-बचाव करते हुए कहा कि यह,'बेवजह का तनाव और भावनाएं' थीं। मुरलीधर नहीं रुके और कहा, 'उन्होंने शुरू किया। सॉलिसिटर इस तरह की उक्ति क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं? एक लॉ ऑफिसर को यह शोभा नहीं देता। मैंने कभी किसी लॉ ऑफिसर को इस तरह की अभिव्यक्ति का इस्तेमाल करते नहीं देखा।' इसपर मेहता ने जवाब दिया, 'आप संविधान को चुनौती नहीं दे सकते।'सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से हलफनामा दायर करने को कहा
इसपर सीजेआई सूर्यकांत ने दखल देते हुए कहा, 'हम सिर्फ संवैधानिक व्याख्या के कानूनी मुद्दों की समीक्षा कर रहे हैं। हम उतने ही तक सीमित रहें।' मुरलीधर फिर बोले, 'लेकिन,लॉ ऑफिसर से शिष्टाचार की अपेक्षा की जाती है।' इस समय आकर बेंच ने याचिका पर केंद्र से काउंटर-एफिडेविट दाखिल करने का आदेश दिया।नक्सलाइट वाली टिप्पणी पर खेद नहीं-सॉलिसिटर जनरल
इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई बेंच के सामने मुरलीधर अपनी बात पर अड़े रहे और कहा, 'विद्वान सॉलिसिटर ने एक ऐसी उक्ति कही, जो लॉ ऑफिसर को शोभा नहीं देता। मैं अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराता हूं।' इसपर जस्टिस बागची ने कहा, 'हमने उन टिप्पणियों को संज्ञान में नहीं लिया है। हम खुद को संवैधानिक मुद्दे तक सीमित रखते हैं।' सॉलिसिटर ने दोहराया कि उन्होंने जो कुछ कहा उसपर उन्हें पछतावा नहीं है।'नक्सली होने से संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होते'
एक दूसरे केस की सुनवाई के लिए मौजूद सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा, 'अपनी अलग सोच रखना, नक्सलाइट होना नहीं है।''नक्सली विचाधारा वाली सोच पर की टिप्पणी'
आखिरकार सॉलिसिटर जनरल ने साफ किया कि वह किसी को नक्सली नहीं कह रहे थे, बल्कि सिर्फ इस तरह की सोच पर टिप्पणी कर रहे थे। उन्होंने कहा, 'ऐसे लोग हैं, जो संवैधानिक तरीके से लिए गए फैसले में विश्वास नहीं करते।' उन्होंने आगे कहा, 'मैं नहीं जानता कि उन्होंने इसे व्यक्तिगत क्यों ले लिया।'दरअसल, टीएम कृष्णा ने नेशनल ऑनर एक्ट में संशोधन करके राष्ट्रगीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान की तरह की सुरक्षा देने और इसके सभी 6 छंद गाने के केंद्र सरकार के सर्कुलर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
पर्यावरण कानून के संशोधन से प्रक्रिया समय और खर्च में 50% तक कटौती की उम्मीद

शिक्षा संस्थानों पर DPDP अधिनियम का दायित्व, APAAR सहमति अब ‘बॉक्स‑टिकिंग’ नहीं

क्या वंदे मातरम् न गाना दण्डनीय अपराध हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने मांगी समीक्षा

गायक जैक‑जे97 को बच्चे की अभिरक्षा का अधिकार मिला, पिता‑पुत्र संबंध स्थापित

क़ानून निर्माण में गुणवत्ता को प्राथमिकता: तेज़ी नहीं, स्थिरता चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष पीठ बनाकर NHAI की बेसहारा पशु आश्रय याचिका पर सुनवाई तय की

राष्ट्रीय सभा की स्थायी समिति ने 2027 के विधायी कार्यक्रम को मंजूरी दी, निरीक्षण कानून सहित 23 विधायी परियोजनाओं को आगे बढ़ाएगी

विद्युत कानून संशोधन पर राष्ट्रीय सभा की स्थायी समिति की विस्तृत राय
ताज़ा ख़बरें
- ऊतक‑अंग दान के विस्तार और दाता सुरक्षा को सुदृढ़ करने का नया विधायी मसौदा
- सुप्रीम कोर्ट ने बनायी विशेष पीठ, NHAI की गाय‑पालन आदेश को चुनौती
- शिक्षा मंत्री ने नई विधायी उपलब्धियों से शिक्षा सुधार में नई दिशा तय की
- राष्ट्रीय सभा की स्थायी समिति ने स्वास्थ्य क्षेत्र में तीन प्रमुख मसौदों पर विचार किया
- सांस्कृतिक उद्योग विकास कानून के मसौदे की पहली व्यापक समीक्षा
- झांसी में अनुदेशक शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश न मानने पर क्रमिक अनशन जारी रखा
- सीजेआई सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का बरगद बताया, विकास‑प्रकृति के संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया
- सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् के अनिवार्य गायन पर सजा न देने का आदेश दिया, सरकार को जवाबदेही का नोटिस भेजा

