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SC ने SIR नोटिसों को ‘मशीन जनित’ कहा, EC से दो हफ़्ते में स्पष्टीकरण मांगा

दिल्ली के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान जारी 33 लाख नोटिसों को सुप्रीम कोर्ट ने यांत्रिक रूप से तैयार माना और चुनाव आयोग को उनके निर्माण‑प्रक्रिया व तत्काल उठाए गए कदमों का जवाब दो हफ़्ते में देने को कहा। कोर्ट ने नोटिसों में स्पष्ट कारण और समाधान का उल्लेख आवश्यक बताया, साथ ही BLO को मतदाताओं के प्रति संवेदनशीलता से मदद करने और सामान्य प्रश्नों के लिए FAQ तैयार करने का निर्देश दिया।

22 सितंबर 2026 को 05:05 pm बजे
SC ने SIR नोटिसों को ‘मशीन जनित’ कहा, EC से दो हफ़्ते में स्पष्टीकरण मांगा

सौजन्य से:- Navbharat Times

दिल्ली मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के तहत जारी 33 लाख नोटिसों को सुप्रीम कोर्ट ने यांत्रिक और 'मशीन से तैयार' मानते हुए चुनाव आयोग से दो हफ्ते में जवाब मांगा है।

नई दिल्ली: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर मतदाताओं को जारी नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गंभीर सवाल उठाए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

दो हफ्ते बाद मामले की अगली सुनवाई

कोर्ट ने कहा कि आयोग यह बताए कि अब तक इस संबंध में क्या तत्काल कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि लगता है कि नोटिस मैकेनिकल तरीके से जारी किया गया हो।

‘नोटिस लगभग मशीन से तैयार लगते हैं’

जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि कुछ नोटिस ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे उन्हें मैकेनिकल तरीके से जारी किया गया हो। उन्होंने कहा, “लगभग मैकेनिकल तरीके से नोटिस जारी किए जा रहे हैं। पूरी संभावना है कि ये मशीन से तैयार नोटिस हैं। इसलिए कृपया जांच करें कि नोटिस जारी करने से पहले कुछ अतिरिक्त फिल्टर की जरूरत तो नहीं है।”

SC ने चुनाव आयोग से पूछा सवाल

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ को लेकर नोटिस में यह स्पष्ट होना चाहिए कि मतदाता को वास्तव में किस जानकारी का स्पष्टीकरण देना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति पहले चंडीगढ़ में मतदान करता था और बाद में दिल्ली आया, तो नोटिस में स्पष्ट रूप से पूछा जाना चाहिए कि वह संबंधित वर्ष में दिल्ली, चंडीगढ़ या किसी अन्य स्थान पर मतदान कर रहा था।

BLO को मतदाताओं की मदद करने का निर्देश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि नोटिस जारी करने से पहले अतिरिक्त मानवीय जांच की जरूरत हो सकती है। पीठ ने यह भी कहा कि नोटिस में मतदाता को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में क्या विसंगति है और उसका समाधान कैसे किया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि कुछ नोटिस लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए जा रहे हैं और ऐसा लगता है कि वे मशीन से तैयार किए गए हैं। उन्होंने कहा कि नोटिस जारी होने से पहले अतिरिक्त मानवीय फिल्टर की जरूरत की जांच की जानी चाहिए।

अस्पष्ट शब्दों से मतदाता को नहीं चलता पता

पीठ ने कहा कि यदि किसी मतदाता के पुराने रिकॉर्ड में किसी वर्ष को लेकर विसंगति है तो नोटिस में साफ पूछा जाना चाहिए कि उसने उस वर्ष दिल्ली में मतदान किया था या किसी अन्य स्थान पर। केवल ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे अस्पष्ट शब्दों से मतदाता को यह पता नहीं चलता कि उसे किस बात का स्पष्टीकरण देना है।

संवेदनशीलता से पेश आने को कहा

अदालत ने बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को प्रभावित मतदाताओं के साथ अधिक संवेदनशीलता से पेश आने और उनकी सहायता करने की जरूरत बताई। सीजेआई ने कहा कि BLO मतदाता को यह बता सकते हैं कि उसके पास कौन-सा प्रमाण उपलब्ध है या पुराने मतदाता रिकॉर्ड में उसका नाम कहां दर्ज है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को SIR से जुड़े सामान्य सवालों के लिए FAQ तैयार करने का सुझाव भी दिया। सीजेआई ने कहा कि 10-15 सामान्य सवालों के मानक जवाब तैयार कर उन्हें अखबारों, वेबसाइटों, नगर निकायों और BLO के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे मतदाताओं को काफी मदद मिलेगी।

33 लाख नोटिस का मुद्दा

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि दिल्ली में करीब 33 लाख लोगों को नोटिस जारी किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने कहा कि इनमें बड़ी संख्या दैनिक मजदूरों की हो सकती है और सभी के लिए ऐसे नोटिस का जवाब देना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है। भूषण ने आरोप लगाया कि कई नोटिस में पर्याप्त कारण और आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं की गई है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के तौर पर माता-पिता और बच्चों की उम्र के बीच अंतर बताया जाता है, तो आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेजों से इसका स्पष्टीकरण कैसे दिया जाएगा।

‘उम्र का अंतर वोट देने की पात्रता से कैसे जुड़ा?’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश प्रशांत भूषण ने कहा कि कुछ नोटिस ऐसे आधार पर जारी किए जा रहे हैं, जिनका मतदाता के वोट देने की कानूनी पात्रता से कोई तार्किक संबंध नहीं है। इनमें माता-पिता और संतान की उम्र में 15 वर्ष से कम अंतर, दादा-दादी और मतदाता की उम्र में 40 वर्ष से कम अंतर या भाई-बहनों के बीच नौ महीने से कम अंतर जैसी श्रेणियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों, गरीब और वंचित लोगों को केवल किसी एल्गोरिदम से सामने आई ऐसी विसंगति के कारण अनिवार्य जांच और नोटिस प्रक्रिया में डालना अनुचित और मनमाना बोझ है।

विसंगति दूर करने का तरीका नहीं बताया गया

भूषण ने कहा कि नोटिस में विसंगति के पूरे तथ्य और उसे दूर करने का तरीका नहीं बताया जाता। मतदाता को केवल ECI द्वारा बताए गए 12 संकेतात्मक दस्तावेजों के साथ उपस्थित होने को कहा जाता है। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी व्यक्ति को माता-पिता की उम्र में अंतर को लेकर नोटिस मिला है तो उसका पासपोर्ट या मैट्रिक प्रमाणपत्र उस विसंगति को कैसे दूर करेगा?

‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की आधिकारिक परिभाषा भी नहीं

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि दिल्ली SIR में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से क्या मतलब है, इसे परिभाषित करने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज अभी उपलब्ध नहीं है। साथ ही, दूसरे स्थान पर जा चुके मतदाताओं से Form 6 भरवाने का मुद्दा भी उठाया गया। दलील दी गई कि Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए है, जबकि स्थान बदलने वाले मतदाता के लिए Form 8 का प्रावधान है। भूषण ने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में स्थानांतरित मतदाताओं को Form 6 भरने के लिए कहा जा रहा है, जिसमें उन्हें यह घोषणा करनी पड़ती है कि उन्होंने पहले कभी मतदान नहीं किया है।

ECI ने कहा- बिना सुनवाई किसी का नाम नहीं कटेगा

चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने याचिका को समय से पहले बताया। उन्होंने कहा कि हर SIR नोटिस में कारण दर्ज है और मतदाता को जरूरत पड़ने पर BLO से संपर्क करने के लिए नाम और मोबाइल नंबर भी दिए जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट आश्वासन दिया, “एक भी मतदाता को सुनवाई का अवसर दिए बिना हटाया नहीं जाएगा।” आयोग ने यह भी कहा कि SIR की प्रक्रिया के लिए कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जा रही है।

दिल्ली में फिलहाल चुनाव नहीं

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने यह भी कहा कि दिल्ली में निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं है। आयोग ने इसी आधार पर बताया कि SIR प्रक्रिया में सामने आने वाली कमियों को दूर करने के लिए पर्याप्त समय है। पीठ ने आयोग को नोटिस जारी करते हुए कहा कि उसके जवाब में अब तक उठाए गए तत्काल कदमों की जानकारी भी दी जाए। मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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