झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन विवाद मामले में प्रार्थी की याचिका खारिज की
झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो के तेतुलिया मौजा स्थित भूमि विवाद से जुड़े 14 वर्ष पुराने मामले में दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि भूमि के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवादित तथ्य होने पर उनका निपटारा संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत दायर रिट याचिका में नहीं किया जा सकता, सक्षम दीवानी अदालत ही उचित मंच है।

सौजन्य से:- Hindustan
जमीन का स्वामित्व-कब्जा विवाद दीवानी अदालत में ही तय होगा, याचिका खारिज
झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो के तेतुलिया मौजा स्थित भूमि विवाद से जुड़े 14 वर्ष पुराने मामले में दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब भूमि के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवादित तथ्य हों, उनका निपटारा संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत दायर रिट याचिका में नहीं किया जा सकता।
रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो के तेतुलिया मौजा स्थित भूमि विवाद से जुड़े 14 वर्ष पुराने मामले में दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जिस मामले में भूमि के स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवादित तथ्य हों, उनका निपटारा संविधान के अनुच्छेद-226 के तहत दायर रिट याचिका में नहीं किया जा सकता, सक्षम दीवानी अदालत ही उचित मंच है। अदालत ने माना कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से चास के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) द्वारा पारित आदेश में कोई त्रुटि नहीं है।
मामले की सुनवाई
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने मोहम्मद शाहिद राजा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। प्रार्थी ने वर्ष 2012 में चास के तत्कालीन एसडीओ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत पुलिस बल की मौजूदगी में दूसरे पक्ष को भूमि पर कब्जा दिलाने का निर्देश दिया गया था। प्रार्थी ने दावा किया कि उसके पिता ने वर्ष 1979 में आठ डिसमिल जमीन खरीदी थी, उसका दाखिल-खारिज भी हो चुका था और वे लंबे समय से कब्जे में थे। उनका आरोप था कि प्रशासन ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर उन्हें जमीन से बेदखल कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना जिला प्रशासन का दायित्व है और इस उद्देश्य से पारित प्रशासनिक आदेशों में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक उनमें शक्ति के दुरुपयोग या स्पष्ट अवैधता का ठोस प्रमाण न हो। इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
सरकार ने कहा- दूसरे पक्ष के कब्जे की हुई थी पुष्टि
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि एसडीओ ने भूमि का स्वामित्व तय करने के लिए नहीं, बल्कि संभावित विवाद और तनाव को देखते हुए केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से कार्रवाई की थी। जांच में यह भी सामने आया कि दूसरे पक्ष ने जमीन की मापी कराई थी और उसके कब्जे की पुष्टि हुई थी। बाद में उक्त भूमि का विधिवत निबंधित बिक्री विलेख के माध्यम से हस्तांतरण भी हो गया।
अदालत ने माना- प्रार्थी ने मूल बिक्री विलेख पेश नहीं किया
अदालत ने पाया कि प्रार्थी ने अपने दावों के समर्थन में मूल बिक्री विलेख तक प्रस्तुत नहीं किया, जबकि याचिका में ऐसा करने की बात कही गई थी। न्यायालय ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने वाला आचरण माना। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जहां भूमि की पहचान, सीमांकन और कब्जे को लेकर विवाद हो, वहां विस्तृत साक्ष्य की आवश्यकता होती है, जिसका परीक्षण रिट क्षेत्राधिकार में संभव नहीं है। ऐसे मामलों का समाधान दीवानी अदालत में ही किया जा सकता है。
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