सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षा में बड़ा परिवर्तन, 8वीं कक्षा का टीचर संविधान, PIL और न्यायपालिका के बारे में पढ़ाएगा छात्रों को
अब 8वीं कक्षा के छात्रों के समाजशास्त्र के पाठ में न्यायपालिका और संवैधानिक उपचारों को पढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनसीईआरटी ने NCERT की सामाजिक विज्ञान पाठ्य पुस्तक में बड़े बदलाव किए हैं।

सौजन्य से:- Vibes Of India
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अंततः राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को पीछे हटना पड़ा है। मंगलवार को परिषद ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के भाग 2 का संशोधित संस्करण जारी कर दिया है।
न्यायपालिका से जुड़े विवादित अध्याय में अब बड़े बदलाव किए गए हैं। पहले जहां अदालतों की आलोचनात्मक तस्वीर पेश की गई थी, वहीं अब इसे न्याय, संवैधानिक उपचारों, अदालतों, न्यायाधिकरणों और विवाद समाधान के एक पारंपरिक नागरिक शास्त्र के पाठ में बदल दिया गया है।
सबसे बड़ा बदलाव अध्याय 4 ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ में किया गया है। नए संस्करण में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ और अदालतों में लंबित मामलों को एक बड़ी चुनौती बताने वाले पुराने हिस्सों को पूरी तरह से हटा दिया गया है। इसके बजाय, अब इस अध्याय की शुरुआत व्यापक सवालों से होती है।
छात्रों से अब पूछा जाएगा कि न्याय की अवधारणा क्या है और एक सामंजस्यपूर्ण समाज के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही भारत में न्यायपालिका की संरचना, उसकी भूमिका और विवाद समाधान के वैकल्पिक तरीकों जैसे सवालों को अध्याय के आरंभ में जगह दी गई है।
किताब के पुराने संस्करण में न्याय प्रणाली में ‘भ्रष्टाचार’ और मुकदमों के ‘भारी बैकलॉग’ का जिक्र था। इसमें CPGRAMS के माध्यम से मिली शिकायतों का हवाला देते हुए बताया गया था कि साल 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई थीं। जिस हिस्से पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ, उसमें स्पष्ट तौर पर लिखा था कि लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं। हालांकि उसमें यह भी जोड़ा गया था कि पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के प्रयास किए जा रहे हैं।
इस साल फरवरी में जैसे ही यह किताब बाजार में आई, वैसे ही भारी विवाद खड़ा हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए इसके भौतिक और डिजिटल दोनों संस्करणों को वापस लेने का आदेश दिया था। सर्वोच्च अदालत का मानना था कि यह अध्याय एक ऐसी धारणा बनाता है मानो न्यायपालिका ने संस्थागत भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया हो, जबकि इसमें संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने में अदालतों की अहम भूमिका को नजरअंदाज कर दिया गया था। इसके बाद NCERT ने माफी मांगते हुए इसे ‘निर्णय की त्रुटि’ करार दिया था और अध्याय को फिर से लिखने का वादा किया था।
अब यह नया और संशोधित अध्याय मुख्य रूप से संवैधानिक ढांचे पर केंद्रित है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायपालिका सरकार के तीन स्तंभों में से एक है और यह विधायिका तथा कार्यपालिका से पूरी तरह स्वतंत्र है।
अध्याय में इस बात पर जोर दिया गया है कि न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका द्वारा पारित कानून संविधान के दायरे में रहें और कार्यपालिका अपनी हदों को पार न करे। यह साफ है कि अब संस्थागत कमियों की जांच-पड़ताल करने के बजाय संस्था की कार्यप्रणाली को सकारात्मक ढंग से समझाने पर जोर दिया गया है।
नए संस्करण में कई बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां भी जोड़ी गई हैं। रिट क्षेत्राधिकार पर एक नया खंड अनुच्छेद 32 और 226 की व्याख्या करता है। इसमें संवैधानिक उपचारों के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों के समक्ष रिट याचिका दायर करने का अधिकार बताया गया है।
जनहित याचिकाओं (PIL) पर एक विस्तृत हिस्सा शामिल किया गया है, जिसे सार्वजनिक चिंता के मुद्दों को हल करने के लिए ‘सुप्रीम कोर्ट द्वारा पेश किया गया एक नवाचार’ बताया गया है। इसे समझाने के लिए हुस्नआरा खातून अंडरट्रायल कैदियों के मामले, एमसी मेहता के पर्यावरण मुकदमे और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न पर विशाखा दिशानिर्देशों का उदाहरण भी दिया गया है।
इस अध्याय में सर्वोच्च न्यायालय के मूल, अपीलीय, सलाहकार और विशेष अनुमति क्षेत्राधिकारों का भी विस्तार से वर्णन है, जिसमें अनुच्छेद 141 और 142 का भी संदर्भ शामिल किया गया है। इसमें देश भर के 25 उच्च न्यायालयों की सूची दी गई है और अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यप्रणाली को समझाया गया है।
इसके अलावा एनसीएलटी (NCLT), उपभोक्ता मंच, एनजीटी (NGT), कैट (CAT), एप्टेल (APTEL) और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (Armed Forces Tribunal) जैसे ट्रिब्यूनल की जानकारी भी छात्रों को दी जाएगी। डिजिटल तकनीक पर आधारित एक नए खंड में ई-फाइलिंग, हाइब्रिड सुनवाई, लाइव स्ट्रीमिंग, फैसलों के अनुवाद और राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।
पाठ्यक्रम में एक और बड़ा बदलाव वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को जोड़ना है। अदालतों का बोझ कम करने के तरीकों के रूप में मध्यस्थता, सुलह, लोक अदालतों और ग्राम न्यायालयों के महत्व को बहुत बारीकी से समझाया गया है। नए जोड़े गए हिस्से में यह भी बताया गया है कि आईपीसी (IPC), सीआरपीसी (CrPC) और साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की जगह अब भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने ले ली है।
इस पूरे विवाद का असर केवल किताब के पन्नों तक ही सीमित नहीं रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस अध्याय से जुड़े तीन शिक्षाविदों – मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार – को सार्वजनिक वित्त पोषित पाठ्यक्रम कार्य से अलग कर दिया जाए। हालांकि बाद में उनका स्पष्टीकरण स्वीकार करते हुए अदालत ने यह आजीवन प्रतिबंध हटा लिया था। फिर भी केंद्र सरकार ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य में ये तीनों शिक्षाविद एनसीईआरटी के किसी भी काम से नहीं जुड़ेंगे।
किताब का यह संशोधित अध्याय अदालतों की कमियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय उनकी संस्थागत भूमिका को मजबूत करते हुए समाप्त होता है। इसके सारांश में लिखा गया है कि न्यायपालिका सरकार के तीन स्तंभों में से एक है और इसकी मुख्य भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि आम जनता को न्याय मिले तथा देश के कानून संवैधानिक ढांचे के भीतर रहें।
अध्याय के अंत में दी जाने वाली गतिविधियों की रूपरेखा को भी अब पूरी तरह से बदल दिया गया है। अब छात्रों को सामाजिक मुद्दों पर उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय को मॉडल पत्र लिखने, मूट कोर्ट का आयोजन करने, स्थानीय न्यायिक हस्तियों का अध्ययन करने और न्याय प्रणाली से जुड़े किसी व्यक्ति से बातचीत करने के लिए प्रेरित किया गया है। कुल मिलाकर, नया अध्याय कक्षा का ध्यान अदालतों में भ्रष्टाचार और देरी से हटाकर संवैधानिक उपायों, न्याय तक पहुंच, जनहित याचिकाओं, डिजिटल पहल, ट्रिब्यूनल और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे अहम विषयों पर केंद्रित करता है।
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