सुप्रीम कोर्ट ने कहा, रोज़मर्रा के घरेलू झगड़े अकेले आत्महत्या उकसाने का आधार नहीं बनते
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल पारिवारिक कलह या प्रताड़ना के दावे से आईपीसी धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिये उकसाने का आरोप स्थापित नहीं किया जा सकता। दहेज से जुड़े एक मामले में संजय कुमार को बरी किया गया, क्योंकि पीड़िता के आत्महत्या के लिये किसी भी प्रोत्साहन के प्रमाण नहीं मिले और निचली अदालतों ने सत्र न्यायालय के उचित कारणों को पर्याप्त रूप से नहीं देखा।

सौजन्य से:- ETV Bharat
'रोज के झगड़ों और प्रताड़ना के आरोपों पर नहीं दर्ज हो सकता आत्महत्या के लिए उकसाने का केस': सुप्रीम कोर्ट
शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश के संजय कुमार को बरी कर दिया, जिनकी पत्नी की 2010 में जहर खाने से मौत हो गई थी.
By Sumit Saxena
Published : September 5, 2026 at 8:49 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ प्रताड़ना के आरोपों या रोज-मर्रा के घरेलू कलह के आधार पर आईपीसी की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता. शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी सालों से लंबित दहेज से जुड़े एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए की. यह फैसला 3 सितंबर को जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की पीठ द्वारा सुनाया गया.
पीठ ने कहा, "यह मुमकिन है कि अपीलकर्ता (पति) और पीड़िता के वैवाहिक जीवन में कुछ विवाद या अनबन रही हो. हालांकि, दंड संहिता (IPC) की धारा 107 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 306 के प्रावधानों को लागू करने के लिए केवल इतना ही काफी नहीं होगा. वास्तव में, ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह इशारा करे कि अपीलकर्ता ने आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई काम किया था."
इसके उलट बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड पर यह बात सामने आई है कि जैसे ही अपीलकर्ता को पता चला कि पीड़िता ने दवा समझकर कोई जहरीला तरल पदार्थ पी लिया है, उसने तुरंत गवाह से चिकित्सकीय मदद मांगी और पीड़िता को फौरन अस्पताल पहुंचाया.
पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सबूतों पर विचार करने के बाद यह साफ है कि सत्र न्यायालय का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही था कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में नाकाम रहा. बेंच ने आगे कहा कि हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता की दोषमुक्ति को पलटने में गलती की, इसलिए उच्च न्यायालय का फैसला रद्द किए जाने योग्य है.
बेंच ने कहा कि सत्र न्यायालय ने इन सभी सबूतों पर विस्तार से विचार किया था और पाया था कि पैसे मांगने या पीड़िता को कर्ज लेने के लिए कहने के आरोप बाद में सोच-समझकर लगाए गए थे. शीर्ष अदालत ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट को ऐसा कोई गवाह नहीं मिला जिसने यह गवाही दी हो कि पीड़िता को कभी किसी भी तरह का अंजाम भुगतने की धमकी दी गई थी.
कोर्ट ने कहा, "गैरकानूनी मांग का कोई सबूत नहीं था. सिर्फ प्रताड़ना को अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता. वास्तव में, यह देखा गया कि गर्भावस्था के दौरान और बच्चे को जन्म देने के बाद भी आरोपी द्वारा पीड़िता के साथ बहुत स्नेहपूर्वक व्यवहार किया गया था. इसी आधार पर सत्र न्यायालय ने सभी आरोपियों को इन आरोपों से बरी कर दिया था."
सत्र न्यायालय द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को हिमाचल प्रदेश सरकार ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पाया कि हाई कोर्ट के चुनौती दिए गए फैसले को देखने से पता चलता है कि वह सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए कारणों की बारीकी से जांच करने में नाकाम रहा.
शीर्ष अदालत ने कहा, "केवल दो पैराग्राफ में फैली अपनी संक्षिप्त चर्चा में, हाई कोर्ट ने यह मानकर अपीलकर्ता को बरी करने के फैसले को पलट दिया कि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी उचित संदेह के यह साबित कर दिया था कि अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया था. हाई कोर्ट ने कहा था कि अपीलकर्ता ने पीड़िता की मां और बहनों के सामने उसके साथ दुर्व्यवहार किया था और उसे घसीटा था. हालांकि, हमें रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिला."
पीठ ने कहा कि वास्तव में, इन गवाहों ने जिरह में यह स्वीकार किया था कि उन्होंने पुलिस अधिकारियों के सामने ऐसे बयान नहीं दिए थे. बेंच ने आगे कहा, "हमारे विचार में, एक अपीलीय अदालत के रूप में हाई कोर्ट के लिए बरी किए जाने के खिलाफ अपील पर विचार करते समय यह निष्कर्ष दर्ज करना आवश्यक था कि या तो सत्र न्यायालय ने एक गलत नतीजे पर पहुंचने के लिए पूरे सबूतों को गलत तरीके से पढ़ा था, या फिर उसके निष्कर्ष का रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से समर्थन नहीं किया जा सकता था." हालांकि, चुनौती दिए गए फैसले में ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है.
शीर्ष अदालत का यह फैसला संजय कुमार द्वारा 2016 के हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है. हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया था और उसे आईपीसी की धारा 306 और 498A के तहत दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.
संजय कुमार का विवाह जनवरी 2008 में लता के साथ हुआ था और 2009 में उनकी एक बेटी हुई थी. आरोप था कि दहेज की मांगों को लेकर प्रताड़ित किए जाने के कारण लता ने जहर खा लिया और अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. इसके बाद कुमार और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी.
जून 2010 में सत्र न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था. बाद में हाई कोर्ट ने परिवार के अन्य सदस्यों के बरी होने के फैसले को तो बरकरार रखा, लेकिन कुमार को दोषी ठहरा दिया. सर्वोच्च अदालत ने पाया कि पीड़िता की बहनों ने खुद यह बयान दिया था कि जब भी वे पीड़िता के ससुराल जाती थीं, तो उनका बहुत अच्छे से स्वागत किया जाता था और उन्होंने प्रताड़ना का कोई भी ठोस उदाहरण नहीं दिया था.
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