दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की पॉश हैंडबुक में पीड़िता के नाम के खुलासे पर कड़ी निंदा की
कोर्ट ने कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़िता की पहचान का खुलासा करना कानून के विरुद्ध है और केंद्र को भी इस नियम का पालन करना चाहिए। जजों ने मंत्रालय से अनुरोध किया कि हैंडबुक में उल्लिखित नामों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को अदालत में पेश किया जाए। आरोपी ने भी याचिका दायर की थी कि अब सुलझे मामले के कारण हैंडबुक से उसका नाम हटाया जाए।

सौजन्य से:- ETV Bharat
यौन उत्पीड़न पीड़िता की पहचान उजागर होने पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- केंद्र सरकार को भी कानून का पालन करना होता है
कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हैंडबुक में पीड़िता का नाम कैसे उजागर किया गया. आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?
Published : September 9, 2026 at 10:04 AM IST
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की तरफ से जारी प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हरैसमेंट (पॉश) हैंडबुक में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़ित महिला की पहचान उजागर करने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच ने कहा कि केंद्र को भी कानून का पालन करना होगा.
कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हैंडबुक में पीड़िता का नाम कैसे उजागर किया गया. आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप भारत सरकार हैं. आप खुद पीड़िता का नाम उजागर करने वाला हैंडबुक प्रकाशित कर रहे हैं. उसे प्रसारित कर रहे हैं. यह आपकी आधिकारिक वेबसाइट पर है. कोर्ट ने कहा कि जज भी पीड़िता का नाम नहीं लिखते और उनके नाम की जगह एक्स का इस्तेमाल करते हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील से कहा कि वे इस सामग्री के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के नामों के साथ कोर्ट में आएं.
दरअसल पॉश कानून यौन अपराध का सामना करने वाली महिलाओं व किशोरियों की पहचान उजागर करने पर रोक लगाता है. यह दंडनीय अपराध है.
कोर्ट उस व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही है जो मामले में आरोपी था और जिसकी दलील थी कि मामला अब सुलझ चुका है, इसलिए हैंडबुक से उसका नाम हटाने का निर्देश दिया जाए. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि कथित घटना से जुड़े एक श्रम न्यायाधिकरण के आदेश को मंत्रालय की पॉश हैंडबुक में एक उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया है, जिसमें न केवल उसकी पहचान, बल्कि पीड़ित महिला का नाम भी उजागर किया गया है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह हैंडबुक इंटरनेट पर हर जगह मौजूद है. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि हैंडबुक नवंबर 2015 में शैक्षिक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित की गई थी, जबकि दोनों पक्षों ने मामला हाल ही में सुलझाया है.
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