45 साल पुरानी डकैती अधिनियम पर हाईकोर्ट ने डीजीपी व 6 जिलों के एसपी को औचित्य पूछे
मध्यप्रदेश में अब डकैत नहीं रहने की सरकार की स्वीकृति के बाद, हाईकोर्ट ने 1981 के डकैती अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाए। अदालत ने प्रदेश के गृह विभाग के सचिव, डीजीपी और छः जिलों के पुलिस अधीक्षकों को चार हफ्तों में इस कानून के प्रयोग का कारण बताने का नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अधिनियम का दुरुपयोग छोटे‑मोटे विवादों में ग्रामीणों के खिलाफ FIR दर्ज करने में हो रहा है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
जब प्रदेश में डकैत नहीं तो 45 साल पुराना कानून क्यों? हाईकोर्ट ने डीजीपी समेत 6 जिलों के एसपी से मांगा जवाब
मध्य प्रदेश सरकार ने स्वीकारा प्रदेश में अब नहीं डकैत, पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने डकैती अधिनियम को हाईकोर्ट में दी चुनौती, मंगलवार को हुई सुनवाई. पीयूष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.
By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : September 9, 2026 at 8:06 AM IST
|Updated : September 9, 2026 at 8:23 AM IST
ग्वालियर : मध्यप्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और लहर से विधायक रह चुके डॉ. गोविंद सिंह ने ग्वालियर चंबल-अंचल में 45 साल पुराने डकैती अधिनियम को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच में इसे लेकर जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसपर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. इस सुनवाई को दौरान हाईकोर्ट ने डीजीपी समेत 6 जिलों के एसपी से डकैती एक्ट पर जवाब मांगा है.
जब डकैत ही नहीं, तो इस एक्ट के तहत मामले क्यों?
हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच में डकैती अधिनियम 1981 के खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई. इस याचिका में याचिकाकर्ता डॉ. गोविंद सिंह की ओर से दलील दी गई कि जब सरकार स्वीकार कर चुकी है कि प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह नहीं है, तब डकैती अधिनियम के तहत ग्वालियर चंबल अंचल में मामले क्यों दर्ज हो रहे हैं.?
'सरकार ने स्वीकारा प्रदेश में अब डकैत नहीं, फिर अधिनियम की क्या जरूरत?'
याचिकाकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट राजीव शर्मा के मुताबिक, " माननीय न्यायालय के सामने हुई सुनवाई में डकैती अधिनियम के खिलाफ दलीलें पेश की गईं, जिनमें सरकार द्वारा विधानसभा में स्वीकार की जा चुकी बात की, 'मध्यप्रदेश में अब कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है' और डकैती अधिनियम डकैतों के खिलाफ बनाया गया था, ऐसे में जब सरकार के मुताबिक अब प्रदेश में डकैत नहीं है तो डकैती अधिनियम को अब भी लागू रखना अप्रासंगिक है."
पुलिस पर डकैती अधिनियम का दुरुपयोग करने का आरोप
जनहित याचिका में मध्य प्रदेश पुलिस की ओर से डकैत अधिनियम 1981 की धाराओं को आज भी जारी रखने पर कुछ प्रमुख बिंदु भी उच्च न्यायालय के सामने रखे गए हैं. जिनमें पुलिस पर अधिनियम का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया, '' ग्वालियर चंबल अंचल में पुलिस मामूली विवाद, आपसी रंजिश, छोटे-मोटे विवादों में भी डकैती अधिनियम 1981 की धारा 11 और 13 के तहत मासूम ग्रामीणों और किसानों के खिलाफ मामला दर्ज कर देती है, इस अधिनियम की धारा 5(1) का उपयोग कर आरोपी को अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध का फायदा उठाया जाता है.''
डकैती खत्म लेकिन एक हजार FIR
याचिकाकर्ता के वकील के मुताबिक, जनहित याचिका में दलील दी गई है कि, मध्य प्रदेश में ग्वालियर चम्बल अंचल के शिवपुरी, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, श्योपुर और दतिया जिलों में बीते 5 वर्ष यानी 2020 से अब तक पुलिस ने करीब एक हजार से ज्यादा मामलों में डकैती अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की है. जब प्रदेश में डकैत ही नहीं तो इस अधिनियम की आवश्यकता ही क्या है? इससे मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है, इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए.
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कोर्ट ने गृह विभाग और पुलिस के आला अधिकारियों को भेजा नोटिस
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जनहित याचिका की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए अंचल के 6 जिले शिवपुरी, भिंड, मुरैना, दतिया, श्योपुर और ग्वालियर के पुलिस अधीक्षकों के साथ साथ मध्यप्रदेश गृह विभाग के सचिव और मध्यप्रदेश के डीजीपी से डकैती अधिनियम के इस्तेमाल और औचित्य को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है.
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