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भ्रष्टाचार मामलों में अत्यधिक सबूतों से हुई देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाई चिंता, एक आरोपी को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि अभियोजन ने 62 गवाहों की पूछताछ की, पर हाई कोर्ट ने केवल नौ का उल्लेख किया, जिससे मामलों में अनावश्यक सबूतों का बोझ बढ़ा है। अदालत ने कहा कि बिना आर्थिक लाभ के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) लागू नहीं हो सकती, इसलिए आरोपी को रिहा कर बरी कर दिया गया।

9 सितंबर 2026 को 04:32 am बजे
भ्रष्टाचार मामलों में अत्यधिक सबूतों से हुई देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाई चिंता, एक आरोपी को बरी किया

सौजन्य से:- ETV Bharat

सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में एक शख्स को बरी किया, बहुत ज्यादा सबूतों की वजह से हुई देरी पर सवाल उठाए

बेंच ने पाया कि अभियोजन ने मामले में 62 गवाहों से पूछताछ की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनमें से केवल नौ का ही जिक्र किया.

By Sumit Saxena

Published : September 9, 2026 at 8:55 AM IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई में होने वाली लंबी देरी पर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अक्सर अदालतों को 'बेमतलब' के सबूतों के ढेर में डुबो देता है, जो आरोपों को साबित करने में नाकाम रहते हैं.

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने 1993 के भ्रष्टाचार के एक मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए यह बात कही. यह मामला बाद में सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया था. बेंच ने कहा, 'हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि भ्रष्टाचार के मामलों में बहुत ज़्यादा सबूत पेश किए जाते हैं, जो अक्सर कोर्ट के लिए मुश्किल पैदा करते हैं.

खासकर इसलिए क्योंकि सबूत के तौर पर पेश की गई कई बातें आरोपों को साबित करने या आरोपी सरकारी कर्मचारी का अपराध साबित करने से बहुत दूर होती हैं.' बेंच ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष ने इस मामले में 62 गवाहों से पूछताछ की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उनमें से सिर्फ नौ का जिक्र किया.

इनमें से आठ वेटरनरी डिस्पेंसरी के इंचार्ज थे, जिन्हें यह साबित करने के लिए बुलाया गया था कि चालान जारी होने और बिल पास होने के बावजूद दवाइयां सप्लाई नहीं की गई थी. बेंच ने कहा कि जिस एक अन्य गवाह का जिक्र किया गया, वह उस फर्म का असली मालिक और सप्लायर था. उसने पेश होकर न तो कोई पैसा मिलने की बात मानी और न ही दवाइयां सप्लाई करने की बात स्वीकार की.

बेंच ने कहा कि जब विभाग से इतनी बड़ी रकम जारी की गई थी, तो पैसे के लेन-देन (मनी ट्रेल) का पता लगाने के लिए कोई जांच नहीं की गई. बेंच ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन पक्ष की ओर से लंबे समय तक मामले लंबित रहने का इतिहास रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि बहुत ज़्यादा सबूत पेश किए जाते हैं, जो अक्सर गैर-जरूरी और जैसा कि हमने देखा, ज़्यादातर अप्रासंगिक होते हैं. बेंच ने कहा, 'जो भी हो मौजूदा मामले में हमें उस प्रावधान के तहत सजा को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं दिखता, जिसके तहत हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया है.'

बेंच ने कहा, 'इसलिए अपीलकर्ता को बरी किया जाता है. अगर वह हिरासत में है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो. अगर वह पहले से जमानत पर है, तो जमानत बॉन्ड रद्द माने जाएंगे.' बेंच ने कहा कि आर्थिक फायदे के बिना 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' की धारा 13(1)(d) के तहत सजा नहीं दी जा सकती.

बेंच ने कहा, 'आर्थिक फ़ायदे के बिना धारा 13(1)(d) के तहत सजा नहीं हो सकती, और हाई कोर्ट ने साफ़ तौर पर पाया है कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई फ़ायदा नहीं हुआ है.' बेंच ने एक व्यक्ति की अपील पर अपना फ़ैसला सुनाया, जिसमें उसने गुवाहाटी हाई कोर्ट के मई 2018 के दोषी ठहराने वाले आदेश को चुनौती दी थी.

बेंच ने गौर किया कि इस मामले में जांच असम के वेटेरिनरी डिपार्टमेंट से मिली शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी. शिकायत में दवाओं की सप्लाई के लिए फर्ज़ी आरसीसी बिल जमा करके 5,97,200 रुपये का नुकसान होने की बात कही गई थी. दवाएं कभी सप्लाई नहीं की गई, लेकिन एक फर्ज़ी फर्म को पेमेंट कर दिया गया था.

बेंच ने बताया कि दोषी ठहराए गए तीन लोगों ने हाईकोर्ट में अपील की थी. हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को बरी कर दिया, जबकि बाकी दो लोगों को आईपीसी की धारा 120-B (आपराधिक साज़िश) के साथ मिलाकर एक्ट की धारा 13(1)(d) के तहत दोषी ठहराया.

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