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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को पेंशन मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से आग्रह किया कि पेंशन न मिलने से जुड़े मामलों को शीघ्र निपटाया जाए, क्योंकि एक सेवानिवृत्त चपरासी की रिटायर्ड याचिका दो साल से लिस्ट नहीं हुई थी। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की पेंशन प्रक्रिया में देरी की कड़ी निंदा की और मुख्य सचिव को 31‑12‑2026 तक देरी के कारणों की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

7 अक्टूबर 2026 को 01:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को पेंशन मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट का इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से आग्रह: पेंशन मामलों पर प्राथमिकता से करें विचार

Shahadat

7 Oct 2026 5:39 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि वह इस बात पर विचार करें कि क्या पेंशन न मिलने से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जा सकती है और उनका जल्द निपटारा किया जा सकता है। कोर्ट ने यह बात तब कही जब देखा गया कि याचिकाकर्ता की रिट याचिका, जल्द सुनवाई की अर्जी के बावजूद, लगभग दो साल से हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए लिस्ट नहीं की गई।

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच रिटायर्ड चपरासी द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर सुनवाई कर रही है, जिसे रिटायरमेंट के लगभग दस साल बाद भी अपने रिटायरमेंट से जुड़े बकाया पैसे नहीं मिले थे। इस मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की कड़ी आलोचना की।

याचिकाकर्ता को 1984 में चपरासी के पद पर नियुक्त किया गया। 2016 में लगभग बत्तीस साल की सेवा के बाद वह रिटायर हो गए। उनकी सेवा पेंशन के योग्य है और उन्होंने कई शिकायतें दर्ज कराकर अपनी पेंशन जारी करने का बार-बार अनुरोध किया।

2018 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की और रिटायरमेंट से जुड़े लाभों के भुगतान की मांग की। 2024 में हाईकोर्ट ने ऑफिस को निर्देश दिया कि वह राज्य सरकार के काउंटर एफिडेविट (जवाब) को ढूंढे और रिकॉर्ड पर लाए। हालांकि, इसके बाद मामला लिस्ट नहीं किया गया, जिसके चलते उन्होंने अक्टूबर 2025 में जल्द सुनवाई के लिए अर्जी दायर की, जिसे बिना कोई तारीख तय किए अप्रैल 2026 में निपटा दिया गया। इसके बाद उन्होंने 2024 के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने सीनियर एडवोकेट अनीता त्रिपाठी ने याचिकाकर्ता की ओर से कहा कि नौ साल बाद, 2025 में केवल ग्रेच्युटी की रकम का भुगतान किया गया।

इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश सरकार ने तर्क दिया कि 2025 में याचिकाकर्ता के जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) के लिए 7,16,295 रुपये जारी किए गए। एक और कंप्लायंस एफिडेविट (अनुपालन हलफनामा) जमा किया गया, जिसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता को 2026 में पेंशन और अन्य लाभों के तौर पर 29,06,663 रुपये का बकाया दिया गया, और उन्हें महंगाई भत्ते के साथ 11,200 रुपये की नियमित मासिक पेंशन मिलेगी।

मामले के तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि याचिकाकर्ता पिछले ग्यारह सालों से कैसे गुज़ारा कर रहा है। कोर्ट ने देखा कि भले ही रिट याचिका 2018 में दायर की गई, लेकिन पिछले आठ सालों में कुछ नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के तौर पर राज्य की ज़िम्मेदारी थी कि वह याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट पर पेंशन के कागज़ात तेज़ी से मंज़ूर करे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

कोर्ट को रिकॉर्ड से पता चला कि रिटायरमेंट के बाद दस सालों तक, बिना किसी गलती के, याचिकाकर्ता को उसके रिटायरमेंट के बकाया पैसे नहीं दिए गए, जिसे जानकर कोर्ट हैरान रह गया।

कोर्ट ने कहा,

"हम न केवल हैरान हैं, बल्कि हमें गहरा सदमा लगा है कि ऐसा उस कर्मचारी के साथ हो सकता है, जिसने 32 साल तक पूरी निष्ठा से सेवा की हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि याचिकाकर्ता ने एक चपरासी के तौर पर नौकरी शुरू की थी और उसी पद से 31.07.2016 को रिटायर हुआ। इस कोर्ट ने कई बार कहा है कि पेंशन न तो कोई इनाम है और न ही दान, बल्कि यह पहले दी गई सेवाओं के लिए बाद में किया जाने वाला भुगतान है। दूसरे शब्दों में, इसका मतलब है कि हर महीने मिलने वाली सैलरी का एक हिस्सा रोक लिया जाता है और कर्मचारी के रिटायर होने के बाद उसका भुगतान किया जाता है।"

बेंच ने कहा,

"याचिकाकर्ता के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। हम इस मामले को यहीं खत्म करने को तैयार नहीं हैं। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति किसी और कर्मचारी के साथ नहीं होनी चाहिए।"

इसलिए बेंच ने उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे 31.12.2026 तक या उससे पहले एक रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में बताना होगा कि पेंशन के कागज़ात में देरी क्यों हुई, देरी की वजह क्या थी और अलग-अलग चरणों में कौन से अधिकारी/कर्मचारी इसके लिए ज़िम्मेदार हं। ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई करने का प्रस्ताव है और याचिकाकर्ता को मुआवज़ा कैसे दिया जाएगा, इस पर भी जवाब मांगा गया।

साथ ही, ज़रूरी आदेश या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी करने के निर्देश भी दिए गए ताकि यह पक्का किया जा सके कि याचिकाकर्ता जैसे कर्मचारी, जो पेंशन पाने के हकदार हैं, उनके पेंशन के कागज़ात में एक दिन की भी देरी न हो। आदेश की एक कॉपी इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजने का निर्देश दिया गया, ताकि इसे चीफ जस्टिस के सामने रखा जा सके। उनसे अनुरोध किया गया कि वे देखें कि क्या पेंशन न मिलने से जुड़े मामलों को जल्द निपटाने के लिए प्राथमिकता दी जा सकती है।

बेंच ने निर्देश दिया,

"आदेश की एक कॉपी इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजी जाए और उन्हें निर्देश दिया जाए कि वह इस मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस के सामने रखें। हम चीफ जस्टिस से अनुरोध करते हैं कि वे देखें कि क्या पेंशन न मिलने से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जा सकती है और उन्हें जल्द निपटाया जा सकता है।"

इस मामले की अगली सुनवाई 04.01.2027 को होगी।

Case Title : Jagdish Prasad Tripathi v State of UP through its Principal Secretary & Ors

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