हाईकोर्ट ने पुलिस के आदेश‑पालन और जांच में कमी पर दी कड़ी चेतावनी
अधिकारियों ने कहा कि कई मामलों में न्यायालय के आदेशों को लागू नहीं किया जाता और जाँचें अधूरी व देर से होती हैं, विशेषकर सीसीटीवी फुटेज और रिकॉर्ड की उपलब्धता में कमी है। डीजीपी ने इन कमियों को दूर करने के लिए कदम उठाने और समितियों का गठन करने का आश्वासन दिया, जबकि कोर्ट ने सजा दर से अधिक निष्पक्ष, पूर्ण और समयबद्ध जांच पर बल दिया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
पुलिस की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी; कहा- "आदेशों का पालन नहीं किया जाता और जांच भी सही तरीके से नहीं होती"
यूपी डीजीपी ने दिया अनुपालन का भरोसा.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 1, 2026 at 10:33 PM IST
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को लेकर ही नहीं बल्कि पुलिस जांच की गुणवत्ता, समय पर पुलिस का पक्ष और रिकॉर्ड पेश करने तथा जांच से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने में हो रही देरी पर भी चिंता जताते हुए कहा कि समस्या किसी एक मामले तक सीमित नहीं है. कई मामलों में देखा गया कि हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया जाता और जांच भी सही तरीके से नहीं होती.
उन्होंने कहा कि जांच को ठीक तरीके से कराना सुनिश्चित करना डीजीपी की जिम्मेदारी है. कोर्ट ने डीजीपी से पूछा कि इन समस्याओं को दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए. जवाब में डीजीपी ने पुलिस की सजा दर का हवाला दिया. इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हमारी चिंता सजा दर को लेकर नहीं बल्कि खराब और अधूरी जांच को लेकर है.
न्यायमूर्ति समीर जैन ने कहा कि आप सजा दर की बात कर रहे हैं. हम उन जांच की बात कर रहे हैं, जो ठीक से नहीं की गईं. कोर्ट ने पुलिस की ओर से पेश किए जा रहे आंकड़ों की उपयोगिता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश जमीनी हकीकत से परिचित हैं और केवल आंकड़े इस समस्या का समाधान नहीं करते. पीठ ने जांच के रिकॉर्ड और विशेष रूप से सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं होने पर भी चिंता जताई.
कोर्ट ने कहा कि कभी-कभी हलफनामे में सब कुछ होता है लेकिन जब हम रिकॉर्ड मंगाते हैं तो फुटेज नहीं होती. कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में पुलिस की ओर से न्यायालय को समय पर निर्देश और रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में होने वाली देरी का भी मुद्दा उठाया. कहा कि पहले पुलिस से निर्देश लेने के लिए 10 दिन का समय दिया जाता था लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तीन दिन का समय पर्याप्त माना है. पीठ ने डीजीपी से पूछा कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि पुलिस का पक्ष समय पर अदालत के सामने पहुंच जाए.
डीजीपी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि इस संबंध में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे. उन्होंने मामले से संबंधित समितियों के गठन और उनके कामकाज का भी उल्लेख किया. इस पर जस्टिस जैन ने डीजीपी से कहा कि आप सभी सक्षम हैं. हम आपको समस्याएं बताएंगे और आप उनके समाधान का रास्ता निकाल सकते हैं. डीजीपी की व्यक्तिगत पेशी पिछले महीने इसी पीठ की ओर से व्यक्त की गई गंभीर चिंता के बाद हुई.
कोर्ट हत्या के आरोप से जुड़े एक मामले में पुष्पराज सिंह उर्फ बबलू की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने पाया था कि गत 16 जुलाई को राज्य सरकार को 21 जून 2025 की घटना के समय और सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले समय के बीच अंतर को लेकर विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था. इसके बावजूद निर्धारित निर्देश का पालन नहीं किया गया. सरकारी वकील डॉ एसबी मौर्य ने कोर्ट को बताया था कि उन्होंने इस संबंध में दो बार पत्र भेजे लेकिन इसके बावजूद जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया गया. इस पर हाईकोर्ट ने राज्य की ओर से अपने आदेश का पालन नहीं किए जाने को गंभीरता से लिया था.
जस्टिस जैन ने टिप्पणी की थी कि यह इस न्यायालय का घोर अनादर है. यह भी कहा था कि हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करने की समस्या अब बार-बार सामने आ रही है. कोर्ट के अनुसार पुलिस अधिकारियों के इस रवैये के कारण हत्या के मामलों में जमानत याचिकाएं भी लंबे समय तक लंबित रहती हैं. इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर यह बताने का निर्देश दिया था कि पुलिस अधिकारी हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करने में क्यों हिचक रहे हैं.
मंगलवार की सुनवाई में डीजीपी ने न्यायालय को अनुपालन और जांच की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया. हालांकि पीठ ने साफ किया कि न्यायालय जोर केवल सजा दर के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष, पूर्ण और समयबद्ध पुलिस जांच तथा न्यायालय के आदेशों के प्रभावी अनुपालन पर है.
यह भी पढ़ें : इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने की जिद अधिकार नहीं
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