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सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया, न्यायिक कारणों की अनिवार्यता पर बल दिया

सुप्रीम कोर्ट ने राजीव सिंह वगैरा बनाम उत्तर प्रदेश मामले में कहा कि आपराधिक मुकदमे के आदेश में कारण स्पष्ट करना जरूरी है, नहीं तो आदेश अमान्य होगा। कोर्ट ने हाईकोर्ट के 11 अगस्त 2025 के फैसले को रद्द कर मामला वापस उच्च न्यायालय की रोस्टर बेंच को भेज दिया, जहाँ साक्ष्य और कानूनी कसौटी की जांच के बाद नया निर्णय लिया जाएगा।

6 सितंबर 2026 को 06:31 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया, न्यायिक कारणों की अनिवार्यता पर बल दिया

सौजन्य से:- Navbharat Times

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्पणी की है। हाई कोर्ट के फैसले पर गौर करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा है कि आदेश में कारण भी बताना जरूरी है। केसों का बोझ कारण छोड़ने का बहाना नहीं हो सकता।

नई दिल्ली : अदालतों के फैसले काफी अहम होते हैं। काफी विस्तार से लिखे गए गए इन फैसले में पूरी बात पता चल जाती है। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा नहीं होता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक आदेशों में कारण दर्ज करने की अनिवार्यता को एक बार फिर स्पष्ट किया है। Rajeev Singh & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Anr. के Criminal Appeal No. 4109/2026 मामले में शीर्ष अदालत ने 31 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे का सामना कराने जैसे गंभीर परिणाम वाले आदेश में अदालत को यह बताना जरूरी है कि वह किस कानूनी कसौटी के आधार पर उस फैसले तक पहुंची।

क्या है पूरा मामला?

मामला आजमगढ़ के कप्तानगंज थाने में दर्ज वर्ष 2022 की FIR से संबंधित है। FIR में छह लोग आरोपी बनाए गए थे, लेकिन जांच के बाद 3 अक्टूबर 2022 को दाखिल चार्जशीट में इन छह लोगों को आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया गया। बाद में ट्रायल शुरू होने के बाद शिकायतकर्ता ने CrPC की धारा 319 के तहत उन्हें भी आरोपी बनाकर ट्रायल में बुलाने की मांग की। I विशेष न्यायाधीश ने 11 जून, 2025 को इस अर्ज़ी को मंज़ूरी भी दे दी। आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उस आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन एक एकल न्यायाधीश ने को उनकी अपील खारिज कर दी। और यही फैसला सु्प्रीम कोर्ट की नजरों में आया।

धारा 319 CrPC अदालत को यह शक्ति देती है कि ट्रायल के दौरान सामने आए साक्ष्य से यदि किसी ऐसे व्यक्ति की भूमिका प्रथम दृष्टया सामने आती है, जो पहले आरोपी नहीं था, तो उसे भी मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया जा सकता है।

धारा 319 CrPC क्यों बनी अहम?

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर कह दी बड़ी बात

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि न्यायिक आदेश ऐसा होना चाहिए जिससे प्रभावित पक्ष समझ सके कि उसके खिलाफ फैसला लेते समय जज के सामने क्या बात निर्णायक रही।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 319 के तहत किसी व्यक्ति को आरोपी बनाते समय Hardeep Singh v. State of Punjab में संविधान पीठ द्वारा निर्धारित कसौटी को ध्यान में रखना जरूरी है। हाईकोर्ट को ट्रायल के दौरान सामने आए उस साक्ष्य की जांच करनी चाहिए थी जिसके आधार पर उन्हें बाद में आरोपी बनाया गया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारी केस-लोड के कारण आदेश छोटा रखा जा सकता है, लेकिन संक्षिप्तता का मतलब कारणों को पूरी तरह छोड़ देना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे संक्षिप्त और बिना पर्याप्त कारण वाले आदेश को स्वीकार करने से इनकार किया।

न्यायिक निर्णय में कारण दर्ज होना केवल औपचारिकता नहीं है। कारण यह दिखाते हैं कि न्यायाधीश ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर अपना दिमाग लगाया है और इससे असफल पक्ष को ऊपरी अदालत में फैसले को प्रभावी ढंग से चुनौती देने में मदद मिलती है।

तर्कसंगत आदेश’ की जरूरत - सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मामलें मेे तथ्यों और फैसले को अधूरा पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का 11 अगस्त 2025 का आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद आपराधिक अपील को हाईकोर्ट की संबंधित रोस्टर बेंच को वापस भेज दिया गया है, जहां आरोपियों, राज्य और शिकायतकर्ता को सुनने के बाद मामले का कानून के अनुसार नए सिरे से फैसला करना होगा।

इस फैसले का व्यापक कानूनी संदेश यह है कि न्यायिक आदेश में सिर्फ परिणाम नहीं, बल्कि परिणाम तक पहुंचने की वजह भी दिखाई देनी चाहिए। खासकर आपराधिक मामलों में किसी व्यक्ति को ट्रायल का सामना कराने का फैसला उसके अधिकारों और स्वतंत्रता पर सीधा असर डालता है, इसलिए अदालत को संबंधित साक्ष्य और लागू कानूनी कसौटी पर अपना न्यायिक विचार स्पष्ट करना होगा।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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