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सुप्रीम कोर्ट की ‘कम्प्लीट जस्टिस’ शक्ति से CJP के FIR क्यों खत्म हुए?

संविधान का अनुच्छेद 142 उच्च न्यायालय को सामान्य प्रक्रिया से आगे बढ़कर ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने की असाधारण अनुमति देता है, जिसका उपयोग हाल ही में जुलाई 2026 के परीक्षा‑विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े FIR को समाप्त करने के आदेश में किया गया। जबकि यह शक्ति कठिन मामलों में राहत प्रदान करती है, इसका व्यापक प्रयोग न्यायिक अधिकार और विधायी शक्ति के संतुलन पर प्रश्न उठाता है।

4 सितंबर 2026 को 06:33 am बजे
सुप्रीम कोर्ट की ‘कम्प्लीट जस्टिस’ शक्ति से CJP के FIR क्यों खत्म हुए?

सौजन्य से:- Navbharat Times

CJP के परीक्षा-विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े FIR खत्म, लेकिन क्यों ?

- दरअसल, भारतीय संविधान का Article 142 सुप्रीम कोर्ट को ऐसी असाधारण शक्ति देता है, जिसका इस्तेमाल सामान्य कानूनी प्रक्रिया से आगे जाकर किसी मामले में ‘Complete Justice’ सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है।

- हालिया CJP मामले में इसी प्रावधान के तहत जुलाई 2026 के परीक्षा-विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े FIRs को खत्म करने का आदेश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में CJI सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना शामिल थे।

- संविधान का Article 142 को लेकर सुप्रीम कोर्ट खुद अलग-अलग मामलों में इसकी सीमाओं पर चर्चा करता रहा है। एक तरफ यह शक्ति कठिन परिस्थितियों में न्याय का रास्ता खोलती है, वहीं दूसरी तरफ इसके बहुत व्यापक इस्तेमाल से न्यायपालिका की शक्तियों और कानून बनाने वाली संस्थाओं के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठते हैं।

Article 142 की संविधान में जरूरत ?

इस मामले में ध्यान देने वाली बात है कि इसका विचार उस कानूनी परंपरा से है, जिसमें लिखित कानून के अभाव में‘ न्याय, निष्पक्षता और अच्छे विवेक’ के आधार पर विवादों का समाधान होता था। संविधान लागू होने के बाद इस प्रावधान की वास्तविक सीमा काफी हद तक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से विकसित हुई।लगभग सात दशकों से ज्यादा समय में अलग-अलग मामलों ने इसकी न्यायिक सीमाओं को आकार दिया है।CJP प्रदर्शनों में FIRs और Article 142 का इस्तेमाल

मामले में जब कोर्ट के सामने केंद्र ने कहा कि वह इन मामलों को आगे नहीं बढ़ाना चाहता। तो शीर्ष अदालत के सामने अपने विवेक और संवैधानिक प्रावधानों के उपयोग का ही रास्ता बचा था। और इसी आधार पर अदालत ने CJP से जुड़े जुलाई 2026 के परीक्षा-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दर्ज FIRs को सुप्रीम कोर्ट ने Article 142 का इस्तेमाल करके खत्म करने का आदेश दिया।एक बात और है खास ...सामान्य स्थिति में किसी FIR को खत्म करने के लिए संबंधित मामले के तथ्यों और अपराध के प्रथमदृष्टया बनने जैसे सवालों की जांच होती है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट को भी आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की शक्ति प्राप्त है।

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Article 142 और ‘Judicial Overreach’ की मुद्दे की बहस

- गौर तलब है कि पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने भी Article 142 के लिए नियंत्रण और संतुलन यानी Checks and Balances की जरूरत पर जोर दिया था। दूसरी ओर, इस प्रावधान के समर्थकों के अनुसार कठिन और असाधारण मामलों में यही व्यापक शक्ति अदालत को तकनीकी बाधाओं के बावजूद वास्तविक न्याय देने में सक्षम बनाती है।

- बात यह भी है कि संविधान ‘Complete Justice’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं देता, इसलिए अदालत के पास परिस्थितियों के अनुसार राहत का दायरा तय करने की काफी गुंजाइश रहती है। आलोचकों का तर्क है कि बहुत व्यापक इस्तेमाल से अदालत ऐसी दिशा में जा सकती है जहां न्यायिक आदेश और कानून बनाने की शक्ति के बीच अंतर कम होने लगे। और यही वजह है कि Article 142 की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी संवैधानिक चुनौती भी मानी जाती है।

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