केरल हाई कोर्ट ने नाबालिग पत्नी के साथ संबंध को पोक्सो एक्ट के तहत अपराध कहा
कोर्ट ने 17 वर्षीय बालिका के साथ बार‑बार यौन शोषण के आरोप में अभियुक्त को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी और कहा कि मुस्लिम रीति‑रिवाजों के तहत निकाह होने पर भी वह पोक्सो अधिनियम की दायरे से सुरक्षित नहीं है। इस निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि 18 वर्ष से कम उम्र की किसी बालिका के साथ शारीरिक संबंध, चाहे वह पत्नी ही क्यों न हो, पोक्सो एक्ट की धारा 42ए के तहत दुष्कर्म माना जाएगा।

सौजन्य से:- jagran.com
नाबालिग पत्नी से संबंध बनाने पर लगेगा पोक्सो एक्ट, केरल हाई कोर्ट ने कहा- धार्मिक मान्यताएं नहीं दे सकती सुरक्षा
केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में स्पष्ट कर दिया है कि कानून और बच्चों ...और पढ़ें
HighLights
- केरल हाईकोर्ट ने 17 साल की लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म करने के आरोपित व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद करने से इनकार किया
- कोर्ट ने कहा कि भले ही उनकी शादी मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों से हुई हो, लेकिन यह उसे पोक्सो एक्ट के तहत आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बचाएगी
पीटीआई, कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में स्पष्ट कर दिया है कि कानून और बच्चों की सुरक्षा से ऊपर कोई भी धार्मिक मान्यता या निजी प्रथा नहीं हो सकती।
कोर्ट ने उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने 17 वर्षीय नाबालिग के साथ बार-बार दुष्कर्म के मामले में आपराधिक कार्रवाई को रद करने की गुहार लगाई थी।
आरोपित का तर्क था कि उन्होंने मुस्लिम रीति-रिवाजों के तहत निकाह किया था, इसलिए वह कानून की नजर में सुरक्षित है। लेकिन जस्टिस जोबिन सेबास्टियन ने मानवीय संवेदनाओं और न्याय के तकाजे को सर्वोपरि रखते हुए एक कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि अक्टूबर 2021 की है, जब आरोपित कथित तौर पर एक नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया और चार दिनों तक लगातार उसका यौन शोषण किया।
विडंबना यह रही कि इस घिनौने कृत्य में अन्य लोगों ने भी सहयोग किया और पीड़ित लड़की के माता-पिता ने भी सब कुछ जानते हुए चुप्पी साधे रखी।
आरोपित के वकील ने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद-2 का हवाला देते हुए यह दलील दी कि 15 से 18 वर्ष की आयु के बीच की अपनी 'कानूनी पत्नी' के साथ शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
हालांकि, हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'इंडिपेंडेंट थाट' मामले के फैसले का हवाला देते हुए इन तर्कों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी बालिका के साथ शारीरिक संबंध बनाना, भले ही वह उसकी पत्नी क्यों न हो, पोक्सो अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।
व्यक्तिगत कानून या धार्मिक रीति-रिवाजों की वैधता चाहे जो भी हो, वे पोक्सो एक्ट की कठोर धाराओं के सुरक्षा चक्र से किसी को नहीं बचा सकतीं।
कोर्ट की यह टिप्पणी उन कुप्रथाओं पर एक बड़ा तमाचा है जो अक्सर बाल विवाह को वैध ठहराने का प्रयास करती हैं।
पट्टांबी के फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में लंबित इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि पोक्सो अधिनियम की धारा 42ए के तहत इस विशेष कानून को अन्य सभी कानूनों पर वरीयता प्राप्त है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि जब बात एक 'बच्चे' (18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति) के अधिकारों और उसकी अस्मिता की आती है, तो कोई भी समझौता या परंपरा कानून के हाथ नहीं बांध सकती।
यह फैसला न केवल उस पीड़िता के लिए न्याय की एक नई उम्मीद जगाता है, बल्कि समाज के लिए भी एक कठोर चेतावनी है कि नाबालिगों के साथ होने वाले अत्याचारों को अब धर्म या विवाह की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता।
कानून की यह अडिग दृष्टि हर उस मासूम को सुरक्षा का अहसास कराती है, जो समाज की कुरीतियों के बीच न्याय की गुहार लगा रहा है।
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