मॉब लिंचिंग पर अलग कानून: जानिए नया कानूनी प्रावधान और इसके महत्व के बारे में
भारतीय न्याय संहिता BNS 2023 में धारा 103(2) के जरिए मॉब लिंचिंग को परिभाषित किया गया है। यह धारा स्पष्ट करती है कि यदि 5 या उससे अधिक व्यक्ति मिलकर किसी व्यक्ति की हत्या करते हैं और हत्या का कारण उसकी जाति, नस्ल, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या ऐसा ही कोई अन्य आधार हो, तो यह विशेष अपराध माना जाएगा।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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मॉब लिंचिंग क्या है ? BNS की धारा 103(2) क्या कहती है?
दरअसल, पुरानी दंड संहिता IPC में मॉब लिंचिंग को परिभाषित ही नहीं किया गया था। लेकिन बदलते वक्त के साथ इसकी जरूरत समझी गई। और भारतीय न्याय संहिता BNS 2023 में धारा 103 (2) के जरिए इसका उल्लेख हुआ। धारा 103(2) स्पष्ट करती है कि यदि 5 या उससे अधिक व्यक्ति मिलकर किसी व्यक्ति की हत्या करते हैं और हत्या का कारण उसकी जाति, नस्ल, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या ऐसा ही कोई अन्य आधार हो, तो यह विशेष अपराध माना जाएगा। ऐसे प्रत्येक आरोपी को समान रूप से उत्तरदायी माना जाएगा। कानून में प्रत्येक सदस्य के लिए मृत्युदंड या आजीवन कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।IPC और BNS में क्या बड़ा अंतर है?
BNS ने पहली बार सामूहिक पहचान-आधारित हत्या को अलग अपराध की श्रेणी में रखा है। चूंकि भारतीय दंड संहिता, 1860 में Mob Lynching नाम से कोई अलग अपराध परिभाषित नहीं था तो ऐसे मामलों में पुलिस सामान्यतः हत्या, गैरकानूनी जमावड़ा या दंगा जैसी धाराओं का प्रयोग करती थी। लेकिन भारतीय न्याय संहिता BNS 2023 के लागू होने के बाद अभियोजन पक्ष को अपराध की प्रकृति साबित करने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार मिलता है। इसमें ध्यान देने वाली बात है कि इसके प्रावधान तभी लागू होंगे, जब हत्या के पीछे पहचान आधारित कारण साबित हो। इसलिए प्रत्येक मामले में तथ्यों का परीक्षण आवश्यक रहेगा।क्या मुसलमानों को UCC से बाहर रखने की मांग जायज है? जानिए संविधान, अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और मॉब लिंचिंग के नए कानून का संबंध
तहसीन पूनावाला मामला जो 2018 में सामने आय़ा था, सुप्रीम कोर्टके दिशानिर्देशों को साफ करता है। मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए निवारक, राहत और दंडात्मक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसमें जिला नोडल अधिकारी की नियुक्ति, त्वरित एफआईआर, और फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनवाई शामिल है।- नोडल अधिकारी: हर जिले में पुलिस अधीक्षक (SP) या डीसीपी रैंक के वरिष्ठ अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा।
- खुफिया तंत्र: भीड़ हिंसा या भड़काऊ भाषण और फर्जी खबरें फैलाने वालों की पहचान के लिए विशेष खुफिया इकाई बनाना।
- पेट्रोलिंग: संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां पुलिस गश्त बढ़ाना ताकि भीड़ को एकत्र होने से रोका जा सके।
- त्वरित कार्रवाई: घटना की सूचना मिलते ही बिना देरी के संबंधित थाने में तुरंत एफआईआर दर्ज करना।
- फास्ट ट्रैक कोर्ट: मामलों की सुनवाई के लिए विशेष/फास्ट ट्रैक अदालतें बनाना, जिन्हें अधिमानतः 6 महीने के भीतर सुनवाई पूरी करनी होती है।
- अधिकारियों की जवाबदेही: यदि कोई पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी अपने कर्तव्य में विफल रहता है, तो उसे जानबूझकर की गई लापरवाही माना जाएगा।
- पीड़ित मुआवजा: चोटों की गंभीरता और आजीविका के नुकसान के आधार पर राज्यों द्वारा पीड़ितों के लिए मुआवजा योजना तैयार करना
किन परिस्थितियों में लागू होगी BNS 2023 की धारा 103(2)
इसमें गौर करने वाली बड़ी बात यह है कि यह धारा हर सामूहिक हत्या पर स्वतः लागू नहीं होती। इसके लिए कुछ आवश्यक कानूनी तत्व मौजूद होने चाहिए। पहला, अपराध में पांच या उससे अधिक लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। दूसरा, सभी आरोपी साझा उद्देश्य के साथ कार्य कर रहे हों। तीसरा, हत्या का कारण पीड़ित की जाति, धर्म, समुदाय, भाषा, लिंग, जन्मस्थान, व्यक्तिगत विश्वास या उससे मिलता-जुलता कोई आधार होना चाहिए। यदि जांच में यह तत्व सिद्ध नहीं होते, तो सामान्य हत्या की धारा लागू हो सकती है।‘पेपर लीक दोषियों को कड़ी सजा मिलेगी - बोले पीएम मोदी’, ऐसे में जानें नए कानूनों के तहत कड़ी सजा का पूरा प्रावधान
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